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रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा निगरानी प्रणाली पोलर-ऑर्बिटिंग सैटेलाइट्स पर निर्भर है, जो दिन में केवल तय समय पर ही खेतों को स्कैन करती हैं. लेकिन किसानों ने पराली जलाने का समय बदल दिया है, जिससे यह प्रणाली अब एक संरचनात्मक कमी बन गई है और ज़्यादातर आग की घटनाएँ पकड़ में नहीं आ पातीं.
पंजाब और हरियाणा में 2024 और 2025 के दौरान होने वाली बड़ी पराली आग की 90% से अधिक घटनाएँ आधिकारिक मॉनिटरिंग सिस्टम्स द्वारा पकड़ में नहीं आ रही हैं. सोमवार को जारी इंटरनेशनल फ़ोरम फ़ॉर एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी (iFOREST) की स्टबल-बर्निंग स्टेटस रिपोर्ट 2025 में यह खुलासा किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, किसान अब पराली जलाने का काम देर दोपहर में कर रहे हैं, जब सैटेलाइट और अन्य निगरानी प्रणालियों की पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर होती है, इस वजह से इस साल दिल्ली की हवा पर पराली जलाने के असर का सही अंदाजा नहीं लग पाया और असली हालात से काफी कम आंकड़े सामने आए.
रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार का वर्तमान मॉनिटरिंग प्रोटोकॉल जिसे इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के CREAMS (कंसोर्टियम फ़ॉर रिसर्च ऑन एग्रोइकोसिस्टम मॉनिटरिंग एंड मॉडलिंग फ्रॉम स्पेस) द्वारा संचालित किया जाता है, ज़्यादातर पराली जलाने की घटनाओं का पता नहीं लगा पाता. इसका कारण यह है कि यह प्रणाली मुख्य रूप से पोलर-ऑर्बिटिंग सैटेलाइट्स पर निर्भर करती है, जो भारत को दिन में सिर्फ 10:30 बजे से 1:30 बजे के बीच ही स्कैन करती हैं.
क्यों दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने का असर कम आँका गया?
रिपोर्ट के अनुसार, इस साल दिल्ली (Delhi) की हवा में पराली जलाने के योगदान को बहुत कम आँका गया क्योंकि MODIS और VIIRS जैसे नासा के सैटेलाइट सिर्फ थोड़ी-सी आग की घटनाओं को ही पकड़ पाए. ये सैटेलाइट सक्रिय आग की गिनती पूरी तरह रिकॉर्ड नहीं कर सके, इसलिए असली स्थिति सामने नहीं आई.
रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा निगरानी प्रणाली पोलर-ऑर्बिटिंग सैटेलाइट्स पर निर्भर है, जो दिन में तय समय पर ही खेतों को स्कैन करते हैं. लेकिन अब किसान पराली जलाने का समय बदल चुके हैं, जिससे यह व्यवस्था कमज़ोर पड़ गई है. iFOREST के अनुसार, SEVIRI सैटेलाइट के हर 15 मिनट पर लिए गए चित्र साफ दिखाते हैं कि ज्यादातर बड़ी पराली आग अब दोपहर 3 बजे के बाद लगती है. यह समय पोलर सैटेलाइट्स की उड़ान के समय से बाहर होता है, इसलिए अधिकतर आग की घटनाएँ रिकॉर्ड ही नहीं हो पातीं.
चंद्र भूषण ने क्या कहा?
iFOREST के सीईओ चंद्र भूषण ने कहा, "हमारे विश्लेषण ने साफ़ और पक्के सबूत दिए हैं कि भारत की मौजूदा पराली-निगरानी व्यवस्था ज़मीन पर हो रही वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती." उन्होंने आगे कहा, "किसान अब पराली दोपहर बाद जलाते हैं, जबकि हमारी निगरानी ऐसी सैटेलाइट्स पर टिकी है जो सिर्फ 10:30 बजे से 1:30 बजे के बीच ही आग की घटनाएँ पकड़ पाती हैं."
रिपोर्ट में बताया गया है कि ज़मीन पर हालात सुधर रहे हैं. पंजाब और हरियाणा में जले हुए खेतों वाली कुल ज़मीन पिछले कुछ वर्षों में 25–35% तक घटी है. रिपोर्ट के अनुसार, जली हुई ज़मीन का आकलन (burnt-area mapping) असली तस्वीर ज़्यादा साफ़ दिखाता है, जबकि सिर्फ आग की घटनाओं की गिनती (active fire counts) यह दिखाती है कि गिरावट बहुत ज़्यादा हुई है, जो पूरी तरह सही नहीं है.
रिपोर्ट ने यह भी कहा कि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने को कम करने के लिए सरकार द्वारा ‘इन-सीटू’ (खेत में ही प्रबंधन) और ‘एक्स-सीटू’ (खेत से बाहर प्रबंधन) तरीकों को बढ़ावा देने से सकारात्मक नतीजे मिल रहे हैं. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में लगभग 20,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र और हरियाणा में 8,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अब भी बड़े पैमाने पर पराली जलाई जा रही है. इसका असर दोनों राज्यों की हवा और दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता पर गंभीर रूप से पड़ रहा है.
CREAMS के आंकड़ों के अनुसार, इस बार 15 सितंबर से 30 नवंबर के बीच पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी गिरावट दर्ज की गई. उत्तरी राज्यों - पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कुल 33,028 घटनाएँ दर्ज की गईं, जबकि 2021 से अब तक इसी अवधि में औसतन 78,850 घटनाएँ होती रही थीं.
Note: This content has been translated using AI. It has also been reviewed by FE Editors for accuracy.
To read this article in English, click here.
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