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Sanchar Saathi App को लेकर हो रहे विवाद के बाद सरकार ने अपना आदेश वापस ले लिया है. (File Photo : Reuters)
Govt revokes order mandating preloading of Sanchar Saathi app after backlash : संचार साथी ऐप को लेकर पिछले कुछ दिनों से चल रही बहस और आलोचनाओं के बीच मोदी सरकार (Modi Govt) ने अपना पुराना आदेश वापस ले लिया है. अब नए या पुराने किसी भी मोबाइल फोन में इस ऐप को पहले से इंस्टाल करना जरूरी नहीं होगा. सरकार ने साफ कहा है कि ऐप पूरी तरह वैकल्पिक रहेगा और इसे डाउनलोड करना या हटाना, दोनों का निर्णय पूरी तरह यूजर्स के हाथ में रहेगा.
क्या था पहला आदेश और क्यों बढ़ा विवाद
28 नवंबर को दूरसंचार विभाग (DoT) ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि सभी स्मार्टफोन कंपनियों और इम्पोर्टर्स को अपने नए फोन में संचार साथी ऐप (Sanchar Saathi App) पहले से इंस्टाल करना होगा. इसके अलावा, पुराने फोन में भी सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए ऐप शामिल करने को कहा गया था. आदेश में यह भी उल्लेख था कि ऐप के किसी भी फंक्शन को डिसेबल या लिमिट नहीं किया जा सकेगा.
यहीं से विवाद शुरू हुआ, क्योंकि लोगों को लगा कि यह कदम यूजर्स की प्राइवेसी पर असर डाल सकता है. विशेषज्ञों ने कहा कि जब कोई ऐप पहले से फोन में डाल दिया जाता है और उसे हटाना या उसके फंक्शन बंद करना मुश्किल हो जाता है. लिहाजा यह कदम निगरानी (सर्विलांस) की आशंकाओं को बढ़ाता है. कई विपक्षी नेताओं, सामाजिक संगठनों और टेक विशेषज्ञों ने भी इस आदेश का विरोध किया.
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सरकार का रुख और संसद में सफाई
टेलीकॉम मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) ने शीतकालीन सत्र (Winter Session) के दौरान संसद में कहा कि सरकार किसी भी फीडबैक के आधार पर आदेश में बदलाव करने के लिए पूरी तरह तैयार है. उन्होंने स्पष्ट किया कि संचार साथी ऐप न तो किसी तरह की जासूसी करता है और न ही करेगा. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि डिजिटल सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है, लेकिन किसी की प्राइवेसी से समझौता किए बिना.
सिंधिया ने यह भी कहा कि संचार साथी ऐप पूरी तरह वैकल्पिक है और यूजर चाहे तो इसे एक्टिवेट कर सकता है या जरूरत न हो तो डिलीट भी कर सकता है. हालांकि पहले जारी सरकारी आदेश में यह भी लिखा था कि ऐप के किसी भी फंक्शन को डिसेबल नहीं किया जा सकेगा, जिस पर सवाल उठे थे. इस पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि “डिसेबल न करने” वाला क्लॉज सिर्फ कंपनियों के लिए था ताकि वे ऐप का अधूरा या गैर-फंक्शनल वर्ज़न न डालें. इसका मतलब यह नहीं था कि यूजर इसे डिलीट नहीं कर सकता.
स्मार्टफोन कंपनियों ने क्यों किया विरोध
इंडस्ट्री के सूत्रों के मुताबिक, फोन निर्माता कंपनियों के सामने एक बड़ी चुनौती यह थी कि उन्हें भारत के लिए खास तौर पर iOS और Android ऑपरेटिंग सिस्टम में बदलाव करने पड़ते. Apple और Google दोनों ही दुनिया में कहीं भी अपने डिवाइस पर सरकार द्वारा बनाई गई ऐप्स को अनिवार्य रूप से प्रीलोड नहीं करते हैं. इसलिए इस आदेश को लागू करना उनके लिए मुश्किल भी था और प्राइवेसी को लेकर उनके ग्लोबल स्टैंड के खिलाफ भी.
संचार साथी ऐप क्या करता है
संचार साथी एक साइबर सुरक्षा के लिए बनाया गया मोबाइल ऐप (Mobile App) है, जो यूजर्स को धोखाधड़ी वाले कॉल, मैसेज और चोरी हुए मोबाइल फोन (Mobile Phones) की शिकायत दर्ज कराने की सुविधा देता है. सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य सिर्फ मोबाइल उपयोगकर्ताओं को सुरक्षित रखना है, न कि किसी की निगरानी करना.
कई साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी ऐप को जबरन फोन में डालना यूजर्स की आज़ादी और सहमति के सिद्धांतों के खिलाफ जाता है. भविष्य में ऐप के फंक्शन्स और बढ़ाने की आशंका भी रहती है जिसे ‘फंक्शनल क्रीपिंग’ कहा जाता है. हालांकि फिलहाल आदेश वापस ले लिया गया है, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने डिजिटल प्राइवेसी पर नई बहस को जन्म दे दिया है.
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