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Protest Against US Attack : वेनेजुएला की राजधानी काराकास में अमेरिकी हमले के खिलाफ रैली में शामिल राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का एक समर्थक. (Photo: AP/PTI)
US Attack on Venezuela : Impact on India : अमेरिका के वेनेजुएला पर हमला करके वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो (Nicolas Maduro) को पकड़कर न्यूयॉर्क ले आने की घटना ने सारी दुनिया में खलबली मचा दी है. यह मामला सिर्फ लैटिन अमेरिका तक सीमित नहीं है. इसका असर भारत जैसे देशों की विदेश नीति, कूटनीतिक संतुलन और अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों पर भी पड़ता है. भारत के लिए तो यह मामला आर्थिक से ज्यादा नैतिक और कूटनीतिक चुनौती बनकर सामने आया है.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और भारत का रुख
अमेरिकी कार्रवाई पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया रूस की ओर से आई है, जिसने वेनेजुएला पर अमेरिका के हमले की आलोचना करते हुए कहा है कि, "यह बहुत चिंताजनक और निंदनीय है." वहीं, यूरोपीय यूनियन ने संतुलित भाषा में अंतरराष्ट्रीय कानून और संयम की बात कही. चिली और कोलंबिया जैसे लैटिन अमेरिकी देशों ने भी चिंता जताई है. लेकिन जी-20 में शामिल बड़े देशों की तरफ से अब तक इस हमले की खुली निंदा नहीं की गई है. ऐसे माहौल में भारत भी जल्दबाजी में कोई बयान देने से बच रहा है.
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क्या है भारत की कूटनीतिक दुविधा?
भारत आमतौर पर अपने सीमाई इलाकों से दूर के विवादों पर बेहद संयमित भाषा में प्रतिक्रिया देता है. लेकिन वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई ने नई दिल्ली को थोड़ी दुविधा में डाल दिया है. एक तरफ अमेरिका है, जिसके साथ भारत व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है. दूसरी तरफ भारत का वह घोषित रुख है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और किसी भी देश के आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप की नीति पर जोर देता रहा है.
ग्लोबल साउथ के कई देश ऐसे मामलों में भारत की ओर देखते हैं कि वह अंतरराष्ट्रीय नियमों की पैरवी करे. ऐसे में अमेरिका की एकतरफा सैन्य कार्रवाई पर पूरी तरह खामोश रहना भी सवाल खड़े कर सकता है.
भारत की सतर्क कूटनीति
वेनेजुएला में भारतीय समुदाय बहुत छोटा है. भारतीय दूतावास के अनुसार वहां करीब 50 एनआरआई और 30 पीआईओ रहते हैं. यही वजह है कि भारत का सीधा हित सीमित हैं. इसके बावजूद हालिया घटनाक्रम के बाद विदेश मंत्रालय ने एडवाइजरी जारी कर भारतीय नागरिकों को गैर-जरूरी यात्रा से बचने और वहां मौजूद लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है.
अमेरिका से रिश्ते और ट्रेड डील की मजबूरी
भारत और अमेरिका के बीच इस समय द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है. यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है, जब डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका पहले ही भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा चुका है. इसमें रूस से तेल खरीदने को लेकर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त जुर्माना भी शामिल है.
भारत का मानना है कि इस मामले में उसे अलग तरह से निशाना बनाया गया, क्योंकि चीन और यूरोप भी रूस से तेल खरीदते रहे हैं, लेकिन उन पर वैसी कार्रवाई नहीं हुई. ऐसे में वेनेजुएला मुद्दे पर भारत के लिए अमेरिका के खिलाफ खुलकर बोलना आसान नहीं है.
वेनेजुएला से भारत के आर्थिक रिश्ते कितने अहम
आर्थिक नजरिए से देखें तो भारत और वेनेजुएला के रिश्ते अब बहुत बड़े नहीं रह गए हैं. हालांकि, एक समय ऐसा था जब वेनेजुएला भारत के लिए तेल का बड़ा स्रोत था. साल 2019-20 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6,397 मिलियन डॉलर था, जिसमें से 6,057 मिलियन डॉलर का आयात भारत ने किया था.
लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई. 2020-21 में यह व्यापार घटकर 1,271 मिलियन डॉलर रह गया. 2021-22 में यह और गिरकर 424 मिलियन डॉलर हो गया. 2022-23 में भी यह सिर्फ 431 मिलियन डॉलर रहा. इन आंकड़ों से साफ है कि वेनेजुएला से तेल आयात लगभग नाममात्र का रह गया है.
राजनीतिक रिश्तों का उतार-चढ़ाव
भारत और वेनेजुएला के राजनीतिक संबंधों का सबसे मजबूत दौर 2005 में देखा गया, जब राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज भारत आए और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बातचीत हुई. इसके बाद 2012 में निकोलस मादुरो, तब वेनेजुएला के विदेश मंत्री के रूप में, भारत आए थे.
शावेज के निधन के बाद भी भारत ने शोक संदेश दिया और उनके अंतिम संस्कार में प्रतिनिधि भेजा. 2014 के बाद मोदी सरकार के दौर में भी दोनों देशों के बीच संपर्क बना रहा, हालांकि वह सीमित रहा. विदेश मंत्री एस जयशंकर और वेनेजुएला के नेताओं की मुलाकातें ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ही सीमित रहीं.
भारत के लिए असली सवाल क्या है
इस पूरे घटनाक्रम में भारत के लिए आर्थिक नुकसान सीमित है, लेकिन नैतिकता और सिद्धांतों से जुड़े सवाल बड़े हैं. अमेरिका का यह कदम अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है. भारत, जो खुद इन नियमों के सम्मान की बात करता रहा है, उसे अपने रुख को बेहद संतुलित ढंग से तय करना होगा.
संभावना यही है कि भारत जल्दबाजी में कोई प्रतिक्रिया जाहिर किए बिना सही समय पर कूटनीतिक भाषा में अपनी चिंता जाहिर करेगा, ताकि न तो अमेरिका के साथ रिश्ते बिगड़ें और न ही सिद्धांतों के मोर्चे पर उसकी स्थिति कमजोर हो.
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