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Budget 2026 Expectations :बजट से पहले राइस एक्सपोर्टर्स ने रखी इंटरेस्ट सबवेन्शन और फ्रेट सपोर्ट दिए जाने की मांग. (AI Generated Image)
Rice Exporters' Budget Expectations 2026 : केंद्रीय बजट 2026 से पहले राइस एक्सपोर्ट सेक्टर ने सरकार के सामने अपनी बड़ी उम्मीदें रखी हैं. भारतीय चावल निर्यातक महासंघ यानी IREF का कहना है कि अगर भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखनी है, तो निर्यातकों को लागत के मोर्चे पर राहत देना जरूरी है. खास तौर पर इंटरेस्ट सबवेन्शन (Interest subvention), फ्रेट सपोर्ट (Freight Support) और टैक्स रिमिशन (Tax Remission) जैसे कदम इस सेक्टर को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
Budget 2026 से राइस एक्सपोर्टर्स की उम्मीदें
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (Indian Rice Exporter's Federation) यानी IREF ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से अपील की है कि आने वाले बजट (Budget 2026) में राइस एक्सपोर्ट सेक्टर को टारगेटेड सपोर्ट दिया जाए. संगठन का कहना है कि 4 प्रतिशत इंटरेस्ट सबवेन्शन, 3 प्रतिशत रोड और रेल फ्रेट सपोर्ट और रिमीशन ऑफ ड्यूटीज एंड टैक्सेज ऑन एक्सपोर्टेड प्रोडक्ट्स (Remission of Duties and Taxes on Exported Products) यानी RoDTEP जैसी स्कीम के तहत टैक्स रिमिशन का समय पर भुगतान निर्यातकों की लागत को सीधे कम कर सकता है.
IREF के अध्यक्ष प्रेम गर्ग का कहना है कि “इन उपायों से निर्यातकों की लागत घटेगी, सस्टेनेबिलिटी को बढ़ावा मिलेगा और वैल्यू एडेड एक्सपोर्ट को स्केल करने में मदद मिलेगी.”
ग्लोबल राइस ट्रेड में भारत की मजबूत स्थिति
दुनिया के कुल राइस ट्रेड में भारत की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 20.1 मिलियन टन चावल का निर्यात (Rice Export) 170 से ज्यादा देशों में किया. प्रेम गर्ग के मुताबिक, “राइस एक्सपोर्ट एक स्ट्रैटजिक इकनॉमिक एसेट (Strategic Economic Asset) है, जो किसानों की इनकम, ग्रामीण रोजगार और देश के एक्सटर्नल सेक्टर को सपोर्ट करता है.”
उन्होंने यह भी कहा कि चावल जैसे जरूरी अनाज में भारत की लीडरशिप देश की आर्थिक मजबूती और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रभाव को भी बढ़ाती है.
चावल उत्पादकों और एक्सपोर्टर्स के सामने बड़ी चुनौतियां
हालांकि मजबूत निर्यात के बावजूद धान उत्पादकों और राइस एक्सपोर्टर्स को कई बड़ी चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है. प्रमुख धान उत्पादक इलाकों में ग्राउंड वाटर का लेवल नीचे गिरना, खरीद और भंडारण की ऊंची लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों का उतार-चढ़ाव बड़ी समस्याएं हैं.
प्रेम गर्ग का कहना है कि “यूनियन बजट 2025-26 में ऐसे फिस्कल और अन्य मजबूत उपायों की जरूरत है, जो प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के साथ-साथ सस्टेनेबिलिटी और किसानों के हितों को भी मजबूत करें.”
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वर्किंग कैपिटल और फ्रेट कॉस्ट में राहत की मांग
वर्किंग कैपिटल को लेकर IREF ने एक्सपोर्ट क्रेडिट पर 4 प्रतिशत इंटरेस्ट सबवेन्शन की मांग दोहराई है, खासकर MSME राइस एक्सपोर्टर्स के लिए. संगठन का कहना है कि इससे फाइनेंसिंग कॉस्ट कम होगी, कैश फ्लो सुधरेगा और कीमतों के मामले में अंतरराष्ट्रीय बाजार की होड़ में टिकना आसान होगा.
इसके अलावा क्लस्टर से पोर्ट या ड्राई पोर्ट कहे जाने वाले इनलैंड कंटेनर डिपो (Inland Container Depot - ICD) तक भेजे जाने वाले चावल पर 3 प्रतिशत घरेलू फ्रेट की भरपाई की मांग भी की गई है. इससे लॉजिस्टिक लागत घटेगी और इनलैंड क्लस्टर्स को भी राहत मिलेगी.
रेट्रोस्पेक्टिव ड्यूटी पर वन-टाइम राहत की मांग
IREF की एक अहम मांग 20 प्रतिशत एक्सपोर्ट ड्यूटी से जुड़े पुराने विवादों पर वन-टाइम छूट को लेकर है. संगठन का कहना है कि ड्यूटी बेस और कैलकुलेशन को लेकर अलग-अलग डिफिनिशन की वजह से कई निर्यातकों को पिछली तारीखों से जोड़कर बड़े डिमांड नोटिस मिले हैं.
IREF के अनुसार, “इससे बिना किसी गलत इरादे के किए गए निर्यात पर बड़े विवाद खड़े हो गए हैं. ऐसे मामलों में वन-टाइम छूट दिए जाने से गैर-जरूरी मुकदमेबाजी कम होगी, नियमों का पालन करने वाले निर्यातकों को राहत मिलेगी और सेक्टर की स्टेबिलिटी बनी रहेगी.”
सस्टेनेबल खेती और प्रीमियम वैरायटी पर जोर
IREF का कहना है कि सरकार को चाहिए कि वो पानी बचाने और खेती की कम एमिशन वाली तकनीक (low-emission practices) अपनाने पर टैक्स और निवेश से जुड़े इंसेंटिव देने की योजनाएं लाए. इसमें अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग (Alternate Wetting and Drying), डायरेक्ट सीडेड राइस (Direct Seeded Rice), लेजर लेवलिंग और एनर्जी एफिशिएंट मिलिंग जैसी तकनीकें शामिल हैं.
इसके साथ ही संगठन ने खेती को धान की प्रीमियम और हाई वैल्यू किस्मों की ओर मोड़ने की बात भी कही है. इसमें प्रीमियम बासमती, GI टैग, ऑर्गेनिक और स्पेशलिटी गैस-बासमती चावल शामिल हैं, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकें और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदारी का दबाव भी घटे.
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