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Investment Strategy : नए नियमों से लिखें निवेश की नई कहानी - आपकी इनवेस्टमेंट स्टोरी को हिट बनाने के लिए ये 5 बातें जरूरी

Financial Planning for New Year : नए साल में सफल फाइनेंशियल प्लानिंग के लिए इन 5 बातों को ध्यान में रखना है जरूरी, बदलते वक्त में नहीं चलेगा निवेश का पुराना स्टाइल.

Financial Planning for New Year : नए साल में सफल फाइनेंशियल प्लानिंग के लिए इन 5 बातों को ध्यान में रखना है जरूरी, बदलते वक्त में नहीं चलेगा निवेश का पुराना स्टाइल.

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Viplav Rahi
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New Age Investment Strategy : बदलते दौर में सफल निवेश सफल रणनीति के लिए सोच बदलना जरूरी है. (Image : Freepik)

Investment Strategy for Next Year : नये साल पर अक्सर न्यू इयर रिजोल्यूशन यानी नए संकल्प लिये जाते हैं. कोई जिम जॉइन करने का संकल्प लेता है, कोई बेहतर डाइटिंग प्लान शुरू करता है और कोई मन ही मन सोचता है कि “इस बार निवेश सही तरीके से करेंगे”. लेकिन सच यह है कि अगर आप आज भी 10–15 साल पुराने नियमों के भरोसे निवेश कर रहे हैं, तो आपकी इनवेस्टमेंट स्टोरी फ्लॉप हो सकती है. दुनिया बदली है, नौकरी का मिजाज बदला है, खर्चों की चाल बदली है और इसी के साथ निवेश के नियम भी. ऐसे में नए साल में पुराने पैमाने छोड़कर नए रियलिटी चेक के साथ निवेश की नई कहानी लिखना जरूरी है. हम आपको बताते हैं 5 ऐसी बातें, जो आज के दौर में आपकी इनवेस्टमेंट स्टोरी को हिट बनाने के लिए ये जरूरी हैं.

1. महंगाई की हकीकत को ठीक से समझें 

रिटायरमेंट प्लानिंग करते समय या भविष्य की आर्थिक जरूरतों का अनुमान लगाते समय अनुमानित महंगाई दर 6 फीसदी मानकर चलना आम बात है. लेकिन क्या ये काफी है? दरअसल, आज की शहरी जिंदगी में हकीकत इससे काफी अलग हो सकती है. महंगाई दर (Inflation) के आधिकारिक आंकड़े भले ही काबू में दिख रहे हों, लेकिन शहरी मिडिल क्लास के बजट में कई ऐसे खर्च शामिल होते हैं, जिनकी लागत में हर साल इससे कहीं ज्यादा इजाफा होता है. मिसाल के तौर पर बच्चों के स्कूल की सालाना फीस हर साल 10-12 फीसदी या उससे भी ज्यादा रफ्तार से बढ़ सकती है. यही हालत दवाओं और इलाज पर होने वाले मेडिकल खर्च की भी है. इनमें भी सालाना 10–12 फीसदी की रफ्तार से इजाफा होना आम बात है. ऐसे में अगर आपने रिटायरमेंट या भविष्य की जरूरतों का अनुमान सही ढंग से नहीं लगाया तो आगे चलकर मुश्किल हो सकती है. यानी अब फाइनेंशियल प्लानिंग करते समय अलग-अलग चीजों की महंगाई दर का सही अनुमान लगाकर उस हिसाब से प्लानिंग करना बेहद जरूरी है.

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2. उम्र नहीं, जरूरत देखकर तय करें इक्विटी इनवेस्टमेंट

“100 माइनस उम्र” (100 - Age) वाला नियम कभी बड़ा पॉपुलर था. लेकिन आज यह हर किसी के लिए सही नहीं बैठता. वजह साफ है. लोग ज्यादा लंबा जी रहे हैं और रिटायरमेंट के बाद का जीवन 30 साल या उससे ज्यादा लंबा हो सकता है. खास तौर पर फिक्स्ड डिपॉजिट जैसे सुरक्षित विकल्पों पर मिलने वाले मामूली रिटर्न को देखते हुए इक्विटी इनवेस्टमेंट पर नए ढंग से सोचना जरूरी है. डेट से मिलने वाला रिटर्न महंगाई को मुश्किल से मात दे पा रहा है. बल्कि कई बार तो असल कमाई निगेटिव भी हो जाती है. ऐसे में सिर्फ बढ़ती उम्र के साथ-साथ इक्विटी में निवेश कम करते चलना हमेशा समझदारी भरा फैसला नहीं हो सकता. सही सोच यह है कि इक्विटी में निवेश (Equity Investment) उतना रखें, जितना आपकी जरूरत, टाइम होराइजन और रिस्क लेने की क्षमता इजाजत दे. मतलब इक्विटी में निवेश सिर्फ उम्र देखकर नहीं, अपनी जरूरत देखकर तय करें. 

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3. रिटायरमेंट की उम्र अब सिर्फ कागजों में 60 है

कई लोग मानकर चलते हैं कि 58 या 60 साल की उम्र तक नौकरी चल ही जाएगी. लेकिन आज का कॉरपोरेट माहौल कुछ और कहानी कहता है. कई सेक्टर्स में लोग उम्र के चौथे दशक यानी 40s  के आखिर या 50s की शुरुआत में ही जॉब से बाहर हो रहे हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, लागत का दबाव और तेज प्रतिस्पर्धा इसकी बड़ी वजह हैं. दूसरी तरफ जल्दी रिटायर होने का ट्रेंड (FIRE -  Financial Independence, Retire Early) भी जोर पकड़ रहा है. ऐसे में रिटायरमेंट की प्लानिंग करते वक्त कमाई की उम्र 50 साल तक मानकर चलना ज्यादा सुरक्षित है.

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4. पहली सैलरी से ही शुरू कर दें रिटायरमेंट की तैयारी 

पहले माना जाता था कि 40 की उम्र के बाद रिटायरमेंट की सोचेंगे. आज यह सोच बहुत महंगी पड़ सकती है. 25 साल का युवा अगर जल्दी निवेश शुरू करता है, तो वही लक्ष्य पाने के लिए उसे 40 साल के व्यक्ति की तुलना में सिर्फ एक-चौथाई मंथली SIP की जरूरत होती है. यही कंपाउंडिंग का जादू है. NPS जैसे लो-कॉस्ट ऑप्शन युवाओं को छोटी रकम से शुरुआत का मौका देते हैं. जल्दी शुरुआत करने से न सिर्फ बड़ा कॉर्पस बनता है, बल्कि बाद की जिंदगी में कर्ज की जरूरत भी कम होती है.

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5. EMI का पुराना फॉर्मूला हर किसी पर फिट नहीं बैठता

कभी कहा जाता था कि आपकी सारी ईएमआई (EMI) कुल मिलाकर सैलरी के 40 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. लेकिन बड़े शहरों में घरों की कीमतें जिस तरह बढ़ी हैं, वहां अब इस नियम को फॉलो करना व्यावहारिक नहीं रह गया है. आज डबल इनकम परिवार ज्यादा हैं और अगर नौकरी स्टेबल है और इमरजेंसी फंड मजबूत है, तो होम लोन की ईएमआई 50-55 फीसदी तक जाना भी कई मामलों में चल सकता है. लेकिन एक शर्त हमेशा रहेगी. बीमा, जरूरी निवेश और इमरजेंसी फंड से कोई समझौता नहीं. वहीं पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड या बीएनपीएल जैसे अनसिक्योर्ड लोन पर लगाम जरूरी है. ये खर्च अगर कंट्रोल से बाहर हुए, तो आपका पूरा फाइनेंशियल प्लान हिल सकता है.

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