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बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा EPFO बिना ऋणी को पूर्व नोटिस दिए भुगतान रोक नहीं सकता.
बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) धारा 8-F के तहत किसी भी प्रकार की रोक लगाने का आदेश केवल तभी जारी कर सकता है जब पहले उस व्यक्ति को नोटिस दिया जाए और उसे जवाब देने का मौका मिले. कोर्ट ने कहा कि इन अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन न करना कानून और न्याय के नियमों का उल्लंघन है.
विवाद कैसे शुरू हुआ
यह मामला B.T. कदलाग कंस्ट्रक्शंस द्वारा दायर किया गया था, जिसने नासिक में एक चीनी कारखाने को लीज़ पर लिया था. यह कारखाना मूल रूप से एक सहकारी चीनी मिल का था, जिसने ऋण चुकौती में डिफॉल्ट किया था. इन ऋण डिफॉल्ट्स के कारण नासिक जिला केंद्रीय सहकारी बैंक ने SARFAESI अधिनियम के तहत कारखाने पर कब्ज़ा किया और इसे याचिकाकर्ता को लीज़ पर दिया. याचिकाकर्ता ने लीज़ का किराया सीधे बैंक को भुगतान किया.
इस दौरान, EPFO ओल्ड मैनेजमेंट से लगभग ₹2.52 करोड़ की भविष्य निधि बकाया राशि वसूलने की कोशिश कर रहा था.
EPFO का प्रोहिबिटरी आर्डर
22 अगस्त 2025 को, EPFO ने अचानक एक प्रोहिबिटरी आर्डर जारी किया और याचिकाकर्ता को डिफॉल्ट करने वाले एम्प्लायर का "ऋणी" माना. इस आदेश के तहत याचिकाकर्ता बैंक को लीज़ का किराया नहीं दे सकता था और उसे यह पैसा रिकवरी अधिकारी को देना था.
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि EPFO ने कभी भी धारा 8-F(3) के तहत अनिवार्य नोटिस जारी नहीं किया और न ही शपथ पत्र प्रस्तुत करने का अवसर दिया. ये कदम किसी भी ऋणी की राशि जब्त करने से पहले अनिवार्य हैं.
हाई कोर्ट के विचार
हाई कोर्ट ने कहा कि भविष्य निधि की बकाया राशि कानून के हिसाब से प्रायोरिटी पर होती है. कोर्ट ने यह भी बताया कि अगर कोई लीज़धारक किसी बैंक जैसे सुरक्षित ऋणदाता के माध्यम से संपत्ति लेता है, तो उसे भी धारा 17-B के तहत “स्थानांतरितकर्ता” माना जा सकता है.
लेकिन कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि धारा 8-F की प्रक्रिया बहुत सख्त है, जैसे इनकम टैक्स एक्ट में होती है. इसलिए, किसी पर रोक लगाने से पहले नोटिस देना, शपथ पत्र जमा करने का मौका देना और सही तरीके से जांच करना जरूरी है.
अंतिम फैसला
चूंकि EPFO ने ये सभी अनिवार्य कदम नहीं उठाए थे, इसलिए कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ जारी प्रोहिबिटरी आर्डर को रद्द कर दिया. हालांकि कोर्ट ने उसी आदेश को धारा 8-F के तहत नोटिस के रूप में मान्यता दी और याचिकाकर्ता को शपथ पत्र दाखिल करने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया.
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Note: This content has been translated using AI. It has also been reviewed by FE Editors for accuracy.
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