scorecardresearch

बच्चों की पढ़ाई के लिए घर बेचना जोखिम भरा है। एजुकेशन लोन, स्कॉलरशिप और निवेश से ही बनेगा सही फंडिंग प्लान।

भारत में शिक्षा खर्च 10-12% सालाना की दर से बढ़ रहा है, जबकि सैलरी और प्रॉपर्टी रिटर्न पीछे हैं। ऐसे में पढ़ाई के लिए घर बेचना माता-पिता को आर्थिक और भावनात्मक रूप से कमजोर कर देता है। एजुकेशन लोन, शुरुआती निवेश और स्कॉलरशिप बेहतर विकल्प हैं।

भारत में शिक्षा खर्च 10-12% सालाना की दर से बढ़ रहा है, जबकि सैलरी और प्रॉपर्टी रिटर्न पीछे हैं। ऐसे में पढ़ाई के लिए घर बेचना माता-पिता को आर्थिक और भावनात्मक रूप से कमजोर कर देता है। एजुकेशन लोन, शुरुआती निवेश और स्कॉलरशिप बेहतर विकल्प हैं।

author-image
Parth Parikh
New Update
education loan

शिक्षा के लिए प्रॉपर्टी बेचना फायदेमंद नहीं, बल्कि एक खतरनाक दांव है Photograph: (canva)

पिछले हफ्ते मैंने आय वृद्धि और स्कूल फीस के बीच अंतर के बारे में लिखा था। सैलरी करीब 6% बढ़ी है, जबकि कई स्कूलों ने फीस 12% या उससे अधिक बढ़ा दी है।

यह बोझ उन माता-पिता पर पहले से ही दिख रहा है जो स्कूल-स्तर के खर्च पूरे कर रहे हैं लेकिन प्रेशर यहीं खत्म नहीं होता।

Advertisment

जब बच्चे विदेश जाना चाहते हैं या उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते हैं, तो फीस के यह आंकड़े लाखों से बढ़कर दर्जनों लाख तक पहुंच जाते हैं। मैंने कई मामलों में देखा है कि माता-पिता इस अंतर को पाटने के लिए रियल एस्टेट का सहारा लेते हैं।
कुछ लोग अपनी प्रॉपर्टी पर लोन उठा लेते हैं, कुछ और आगे बढ़कर वह प्रॉपर्टी बेच देते हैं जो परिवार ने वर्षों तक संभालकर रखी होती है। इसे ईंट और जमीन को बेच कर अगली पीढ़ी के अवसर और सुरक्षा प्रदान करना एक त्याग माना जाता है।

लेकिन आज के बाजार में यह रास्ता पहले से कहीं ज्यादा जोखिम भरा हो गया है।

Also Read: निप्पॉन इंडिया म्‍यूचुअल फंड की नंबर 1 स्‍कीम, 15 साल में 16 गुना बढ़ाया पैसा, AUM 65,000 करोड़ के करीब

ठहरी हुई प्रॉपर्टी, आसमान छूती पढ़ाई की फीस

कई शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतें ठहर गई हैं, जबकि उच्च शिक्षा की लागत तेजी से बढ़ रही है। वह परिवार जो कभी मानते थे कि प्रॉपर्टी बेचकर वे दौलत अनलॉक कर रहे हैं, आज समझ पाते हैं कि प्रॉपर्टी बेच कर मिलने वाला पैसा बमुश्किल केवल खर्चों को ही पूरा कर पाता है।

फैसले को समझना

अगर आप माता-पिता से पूछेंगे, तो ज्यादातर यही कहेंगे कि बच्चे की पढ़ाई के लिए प्रॉपर्टी बेचना एक जिम्मेदार फैसला है।

माता-पिता मानते हैं कि वे अपनी संपत्ति को बच्चे के भविष्य में निवेश करने के लिए अनलॉक कर रहे हैं। आखिरकार, ऐसी जमीन या फ्लैट का क्या फायदा अगर वह अगली पीढ़ी को बेहतर जीवन दिलाने में काम न आए?

कई सालों तक यह तर्क सही भी लगता रहा क्योंकि रियल एस्टेट की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं। जब तक बच्चा उच्च शिक्षा के लिए तैयार होता, तब तक घर या जमीन की कीमत इतनी बढ़ जाती कि खर्च आसानी से निकल जाता।

लेकिन आज के आंकड़े एक बिल्कुल अलग कहानी बताते हैं।

पिछले एक दशक में भारत के रिहायशी प्रॉपर्टी मार्केट में तेज़ गिरावट आई है। कई शहरों में कीमतें महंगाई के हिसाब से  बढ़ी ही नहीं हैं।

मार्केट रिसर्च के अनुसार, 2025 के मध्य में देश के टॉप सात शहरों में अनसोल्ड हाउसिंग स्टॉक 5.6 लाख यूनिट से अधिक पहुंच गया। यह न केवल ओवरसप्लाई बल्कि कमजोर मांग को भी दिखाता है।

आज बाजार में कोई प्रॉपर्टी लिस्ट करने पर वह महीनों तक बिना खरीदार के पड़ी रह सकती है, और अंत में मिलने वाली बिक्री कीमत भी उम्मीद से कम होती है। लगातार डबल-डिजिट रिटर्न की बातें अब पूरी तरह गलत साबित हो चुकी हैं।

Also Read:SBI फाउंडेशन 23,230 बच्चों को देगा सालाना 15,000 रुपये से 20 लाख तक स्कॉलरशिप, एप्लिकेशन प्रॉसेस और डेडलाइन समेत हर जानकारी

आइए अब इसे बढ़ते शिक्षा खर्च के साथ रखकर देखें।

भारत में प्रोफेशनल डिग्री की फीस कई गुना बढ़ चुकी है। प्राइवेट कॉलेज से मेडिकल डिग्री लेने का खर्च ₹50 लाख से अधिक हो सकता है। IIM से MBA की फीस अब ₹20 से ₹25 लाख के बीच है। प्रमुख प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ में लिबरल आर्ट्स और इंजीनियरिंग प्रोग्राम भी इससे पीछे नहीं हैं।

और, जब छात्र एजुकेशन के लिए विदेश की ओर देखते हैं, तो आंकड़े और भी तेजी से बढ़ जाते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया में ट्यूशन फीस और रहने का खर्च मिलाकर सिर्फ एक कोर्स का खर्च आसानी से ₹50 लाख से ₹1 करोड़ तक पहुंच सकता है।

प्रॉपर्टी वैल्यू और शिक्षा खर्च के बीच का अंतर अब इतना बढ़ गया है कि पुरानी रणनीति बिल्कुल काम नहीं करती।

भारत में एजुकेशन इन्फ्लेशन औसतन हर साल 10 से 12 प्रतिशत रहा है, जबकि सैलरी ग्रोथ करीब 6 प्रतिशत के आसपास रही। प्रॉपर्टी एप्प्रिसिएशन दोनों से पीछे रहा है। कई मेट्रो शहरों में यह सिर्फ 2 से 4 प्रतिशत तक सीमित रहा। नतीजा ये हैं कि एक ऐसे एसेट को जो बमुश्किल बढ़ रहा हैं उसे एक ऐसे खर्च के लिए बेचा जा रहा हैं जो डबल डिजिट में बढ़ रहा है।

तस्वीर तब और भी साफ हो जाती है जब हम देखते हैं कि परिवार इस अंतर को कैसे पूरा कर रहे हैं।

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2025 के बीच देश में आउटस्टैंडिंग एजुकेशन लोन्स लगभग दोगुने हो गए। सिर्फ छह साल में इनमें करीब 95% की वृद्धि हुई। 2024 के अंत तक इनकी कुल बकाया राशि ₹1.2 लाख करोड़ से अधिक हो गई।

इसका मतलब है कि प्रॉपर्टी बेचने के बाद भी कई परिवारों को कर्ज लेना पड़ रहा है। यानी, प्रॉपर्टी की बिक्री समस्या का हल नहीं है—यह सिर्फ उसे टालने जैसा है।

यही वजह है कि यह फैसला स्मार्ट प्लानिंग से ज़्यादा मजबूरी का समझौता लगता है। माता-पिता मानते हैं कि वे एक स्थिर एसेट को अवसर में बदल रहे हैं, लेकिन हकीकत में वे लंबी अवधि की सुरक्षा को छोटी अवधि की राहत के लिए बदल देते हैं—वह भी अक्सर कमज़ोर वैल्यू पर।

Also Read: यासीन मलिक का दावा, “मनमोहन ने हाफिज से मिलने पर दिया धन्यवाद, वाजपेयी समेत 6 केंद्र सरकारों ने कश्मीर मामले में किया था शामिल"

क्यों यह सौदा परिवारों को चोट पहुंचाता है

जब कोई परिवार शिक्षा के लिए प्रॉपर्टी बेचता है, तो असर सिर्फ तुरंत मिलने वाले पैसे तक सीमित नहीं रहता।

भारत में रियल एस्टेट सिर्फ बैलेंस शीट पर दर्ज एसेट नहीं है। यह अक्सर परिवार का सुरक्षा जाल (Safety Net) होता है। ये वह सहारा होता है, जिस पर माता-पिता भरोसा करते हैं कि रिटायरमेंट में या इमरजेंसी में मदद करेगा।
इसे एक डिग्री के बदले छोड़ देना उन्हें असुरक्षित बना देता है। एक बार प्रॉपर्टी चली गई, तो वह शायद ही कभी वापस आती है। 

लोन को आप समय के साथ चुका सकते हैं लेकिन एक बार बेचीं गयी प्रॉपर्टी वापिस नहीं रिकवर कर सकते

और यह जोखिम रिटायरमेंट सुरक्षा तक जाता है। कई मिडल-क्लास परिवार आय बंद हो जाने पर प्रॉपर्टी पर ही निर्भर रहते हैं। पढ़ाई के लिए इसे बीच जीवनकाल में बेच देने का मतलब है—बुढ़ापे में कम संसाधन होना, खासकर जब मेडिकल खर्च बढ़ता है या माता-पिता को खुद आर्थिक सहारा चाहिए होता है।

विडंबना यह है कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए अपनी इकलौती सुरक्षा जाल का त्याग कर देते हैं और बाद में उन्हीं बच्चों पर निर्भर होने का जोखिम उठा लेते हैं।

इस फैसले का एक भावनात्मक बोझ भी है।

असंख्य कस्बों और गांवों में जमीन सिर्फ एक वित्तीय निवेश नहीं होती, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली डोर और एक विरासत होती है। मैंने ऐसे परिवारों से बात की है जिन्होंने विश्वविद्यालय की फीस चुकाने के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन बेच दी, और बाद में गहरे नुकसान का अहसास किया। एक पिता ने मुझसे कहा कि उन्हें लगा उन्होंने “शाखाओं को सींचने के लिए जड़ों को काट दिया।” जो जमीन आने वाली पीढ़ियों को सौंपनी थी, वह सिर्फ दो साल के कोर्स की फीस का भुगतान बन गई।

लेकिन परिवार ये फैसले अकेले में नहीं लेते।

 उन्हें एक ऐसे सिस्टम द्वारा लगातार धकेला जाता है जो ऐसे त्याग को सामान्य बना देता है। बैंक और वित्तीय संस्थान एजुकेशन लोन्स को “ड्रीम एनेबलर” यानि सपने को सच करना बताकर प्रचारित करते हैं। ब्रोकरेज फर्म्स प्रॉपर्टी के बदले लोन को आसान समाधान बताती हैं, विज्ञापनों में हंसते-खेलते बच्चे दिखाते हैं जो विदेशी विश्वविद्यालयों की फ्लाइट पकड़ रहे होते हैं। सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स विदेशी डिग्रियों की कहानियों को अंतिम सफलता का प्रतीक बनाते हैं। पड़ोसी और रिश्तेदार लंदन या बॉस्टन पढ़ने गए बेटा-बेटी की चर्चा ऐसे करते हैं मानो वही माता-पिता की असली उपलब्धि हो।

इस माहौल में माता-पिता को लगता है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। उन्हें हर हाल में बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम करना ही है, भले ही इसके लिए उन्हें वह घर बेचना पड़े जिसे बनाने में दशकों की मेहनत लगी हो।

प्रॉपर्टी बेचना या उसे गिरवी रखना अब आखिरी विकल्प नहीं, बल्कि एक सामान्य और अपेक्षित कदम के रूप में देखा जाने लगा है। लेकिन आंकड़े इस असंतुलन को साफ दिखाते हैं। जहां आउटस्टैंडिंग एजुकेशन लोन्स ₹1.2 लाख करोड़ से ऊपर पहुंच गए हैं, वहीं भारत में रिहायशी रियल एस्टेट का रिटर्न वर्षों से लो सिंगल डिजिट में अटका हुआ है। समीकरण का एक हिस्सा तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, जबकि दूसरा रेंग रहा है।

इसीलिए यह फैसला, चाहे कितना भी प्यार और त्याग के साथ लिया जाए, अक्सर माता-पिता और बच्चों, दोनों को नुकसान पहुंचाता है।

बच्चा डिग्री लेकर निकलता है, लेकिन परिवार प्रॉपर्टी जैसी सुरक्षा जाल खो देता है और कभी-कभी कर्ज में भी दबा रह जाता है। आसान कर्ज, सामाजिक दबाव और बढ़ती ट्यूशन फीस ने एक ऐसा चक्र बना दिया है जिसमें माता-पिता लगातार और ज्यादा देते जाते हैं, लेकिन बदले में उन्हें पहले से कहीं कम सुरक्षा मिलती है।

Also Read:Jan Dhan Alert: जन धन अकाउंट हो सकता है बंद, नहीं तो 30 सितंबर तक निपटा लें ये जरूरी काम

फिर से सोचना ज़रूरी है…

मैं यह नहीं कह रहा कि माता-पिता अपने बच्चों को उच्च शिक्षा से वंचित कर दें। सवाल यह है कि हम इसकी फंडिंग कैसे करें।

प्रॉपर्टी बेचना अब डिफ़ॉल्ट जवाब नहीं होना चाहिए। यह परिवारों को उसी समय असुरक्षित बना देता है जब उन्हें अपनी सुरक्षा मजबूत करनी चाहिए।

बेहतर रास्ते मौजूद हैं, भले ही वे आसान न हों।

एजुकेशन लोन्स इसलिए तेजी से बढ़े हैं क्योंकि वे लोन को कई सालों तक चुकाने कि सुविधा देते हैं, नौकरी मिलने के बाद छात्र को लोन चुकाने कि प्रक्रिया में शामिल कर लेते हैं, और इंटरेस्ट पर टैक्स लाभ भी देते हैं। लोन लेने से प्रॉपर्टी सुरक्षित रहती है और परिवार अपनी लंबी अवधि की सुरक्षा नहीं खोता। 

जिन परिवारों के पास एसेट्स हैं, उनके लिए Loan Against Property अब भी एक विकल्प हो सकता है। लेकिन इसे तभी अपनाना चाहिए जब ब्याज दरों, पुनर्भुगतान अवधि और यह कि क्या एक सामान्य शिक्षा ऋण पर्याप्त होगा—इन सबकी तुलना कर ली जाए।

अग्रिम योजना बनाना भी उतना ही ज़रूरी है।

अगर बच्चे छोटे हैं, तो माता-पिता जल्दी शुरुआत कर म्यूचुअल फंड्स या अन्य ग्रोथ इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश कर सकते हैं। इससे समय के साथ एक अलग कॉर्पस तैयार होता है, ताकि परिवार को आगे चलकर कठिन फैसले न लेने पड़ें।

स्कॉलरशिप्स और कम खर्चीले विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। विदेश से डिग्री लेना प्रतिष्ठित लग सकता है, लेकिन उसकी फंडिंग से होने वाले आर्थिक घाव अक्सर कन्वोकेशन फोटो की चमक से कहीं ज्यादा लंबे समय तक रहते हैं।

मैंने इन फैसलों की कीमत करीब से देखी है। ऐसे परिवार, जिन्होंने अपना इकलौता सहारा बेच दिया। ऐसे माता-पिता, जो बिना अपने घर के रिटायरमेंट में प्रवेश कर गए। और ऐसे युवा ग्रेजुएट, जो डिग्री लेकर लौटे, लेकिन यह देखते रहे कि उनका घर तो चला गया और कर्ज अब भी बाकी है।

इसीलिए मेरा मानना है कि अब माता-पिता को ठहरकर सोचना चाहिए। पढ़ाई के लिए प्रॉपर्टी बेचना अब पहले जैसा नहीं रहा। रियल एस्टेट अब वह रिटर्न नहीं देता जो पहले देता था, और शिक्षा खर्च बाकी सब से कहीं तेज़ बढ़ रहा है। त्याग असली है, लेकिन उसका फायदा गारंटीड नहीं।

तो अगर आप इस मोड़ पर खड़े हैं, तो मैं आपसे आग्रह करता हूं कि दो बार सोचें। लोन्स को एक्सप्लोर करें। जल्दी प्लानिंग करें। विकल्पों पर विचार करें। और अपनी प्रॉपर्टी को उसी सेफ्टी नेट  के रूप में बचाकर रखें, जिसके लिए वह बनी है। क्योंकि एक बार यह चली गई, तो इसे वापस बनाने में दशकों लग जाते हैं—और कई बार तो यह संभव भी नहीं होता।

डिसक्लेमर

नोट : इस लेख में फंड रिपोर्ट्स, इंडेक्स इतिहास और सार्वजनिक सूचनाओं का उपयोग किया गया है. विश्लेषण और उदाहरणों के लिए हमने अपनी मान्यताओं का इस्तेमाल किया है.

इस लेख का उद्देश्य निवेश के बारे में जानकारी, डेटा पॉइंट्स और विचार साझा करना है. यह निवेश सलाह नहीं है. यदि आप किसी निवेश विचार पर कदम उठाना चाहते हैं, तो किसी योग्य सलाहकार से सलाह लेना अनिवार्य है. यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है. व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं और उनके वर्तमान या पूर्व नियोक्ताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते.

लेखक परिचय

पार्थ परिख को वित्त और अनुसंधान में दस से अधिक वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में वह फिनसायर में ग्रोथ और कंटेंट स्ट्रेटेजी के प्रमुख हैं, जहां वह निवेशक शिक्षा पहल और लोन अगेंस्ट म्यूचुअल फंड्स (LAMF) जैसे उत्पादों और बैंकों तथा फिनटेक्स के लिए वित्तीय डेटा समाधानों पर काम करते हैं.

Note: This content has been translated using AI. It has also been reviewed by FE Editors for accuracy.

To read this article in English, click here

Education Education Policy Education Loan Best Investment Options Investment