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Mutual Fund : रिस्‍क कम, रिटर्न बेहतर, म्‍यूचुअल फंड की मल्‍टी फैक्‍टर रणनीति क्यों बन रही है टॉप च्‍वॉइस?

Smart Diversification with Multi-Factor Funds : डाइवर्सिफिकेशन कई अलग-अलग तरीकों से हासिल किया जा सकता है. जैसे अलग-अलग एसेट क्लास, सेक्टर, मार्केट कैप और भौगोलिक क्षेत्रों में निवेश करना.

Smart Diversification with Multi-Factor Funds : डाइवर्सिफिकेशन कई अलग-अलग तरीकों से हासिल किया जा सकता है. जैसे अलग-अलग एसेट क्लास, सेक्टर, मार्केट कैप और भौगोलिक क्षेत्रों में निवेश करना.

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Sushil Tripathi
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Multi factor strategy : म्यूचुअल फंड हाउस के बीच एक और थीम फोकस में है, जो है मल्टी फैक्टर इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी. Photograph: (Pixabay)

Multi Factor Mutual Fund : साल 2025 में म्यूचुअल फंड हाउस के बीच एक और थीम फोकस में रही, जो है मल्टी फैक्टर इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी. इस थीम पर अभी फ्रैंकलिन टेम्पलटन (इंडिया) का एनएफओ, फ्रैंकलिन इंडिया मल्टी-फैक्टर फंड निवेश के लिए खुला हुआ है. इस न्यू फंड ऑफर (NFO) में 24 नवंबर 2025 तक सब्सक्राइब किया जा सकता है. फंड हाउस के अनुसार इस स्कीम (New Fund Offer) को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह जोखिम (रिस्क) को संतुलित रखे और नुकसान (डाउनसाइड रिस्क) को कम से कम करे.

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डाइवर्सिफिकेशन का एक खास तरीका

फ्रैंकलिन टेम्पलटन एसेट मैनेजमेंट (इंडिया) के पोर्टफोलियो मैनेजर, अरिहंत जैन का कहना है कि यह स्ट्रैटेजी रिस्क को कम करने के लिए आपके निवेश में डाइवर्सिफिकेशन लाने के महत्व पर जोर देती है. डाइवर्सिफिकेशन कई अलग-अलग तरीकों से हासिल किया जा सकता है. जैसे अलग-अलग एसेट क्लास, सेक्टर, मार्केट कैप और भौगोलिक क्षेत्रों में निवेश करना. लेकिन एक तरीका ऐसा भी है जिसे कम लोग जानते हैं, वह है फैक्टर्स के आधार पर डाइवर्सिफिकेशन, यानी मल्टी-फैक्टर इन्वेस्टिंग.

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3 फैक्टर के बारे में समझना जरूरी

जैन के अनुसार फैक्टर्स उन विशेषताओं को कहते हैं, जो शेयरों या सिक्योरिटीज के रिस्क और रिटर्न के व्यवहार को समझने में मदद करते हैं. ये बताते हैं कि किसी कंपनी का स्टॉक दूसरों से अलग क्यों चलता है. 

पहला फैक्‍टर है क्‍वालिटी. कुछ कंपनियां अपने पियर्स की तुलना में वित्तीय रूप से अधिक स्थिर हो सकती हैं. ऐसी कंपनियों की कमाई (अर्निंग्स) और कैश फ्लो अधिक अनुमानित हो सकते हैं, और उनके स्थिर बिजनेस के कारण उनके स्टॉक में हाई लिक्विडिटी हो सकती है. 

दूसरा फैक्टर वैल्यू है. कुछ कंपनियां ऐसी हो सकती हैं, जिनके बिजनेस फंडामेंटल अच्छे हों, लेकिन फिर भी उनके शेयर बाजार में कम दाम पर ट्रेड होते हैं. यानी उनका वैल्यूएशन बाकी कंपनियों से सस्ता होता है. ऐसी कंपनियों में अच्छे बिजनेस के साथ-साथ लो प्राइस-टू-अर्निंग रेश्यो का सामान्य गुण होता है, जिन्हें वैल्यू स्टॉक भी कहा जाता है.

एक और फैक्टर जो बहुत लोकप्रिय है, वह है मोमेंटम (तेजी). मोमेंटम फैक्टर उन स्टॉक्स पर ध्यान देता है जो बाजार के चढ़ने पर तेजी से ऊपर जाते हैं और बाजार गिरने पर उससे ज्यादा गिरावट देखते हैं. ये स्टॉक मार्केट के मुकाबले ज्यादा वोलैटिलिटी दिखा सकते हैं.

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निवेशक ध्यान में रखें ये बात

निवेशकों को यह याद रखने की जरूरत है कि किसी भी एक मार्केट साइकिल में सभी फैक्टर्स अच्छा प्रदर्शन नहीं करते. इसलिए अलग-अलग फैक्टर्स में डाइवर्सिफाई करना समझदारी है. जैसे - 2020 में कोविड संकट के दौरान क्वालिटी फैक्टर ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया. लेकिन कोविड के बाद 2021 में जब बाजार तेजी से ऊपर गया, तब मोमेंटम फैक्टर ने बेहतर रिटर्न दिए.

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क्यों जरूरी है मल्टी-फैक्टर इन्‍वेस्‍टमेंट?

अलग-अलग फैक्टर्स में निवेश करने से यह जोखिम कम हो जाता है कि पोर्टफोलियो किसी एक ही फैक्टर पर निर्भर रहे और उसी वजह से कम रिटर्न दे. आज टेक्नोलॉजी की मदद से ऐसे एल्गोरिदम और क्वांट मॉडल बनाए जा सकते हैं जो हर मार्केट फेज में सही स्टॉक को पहचान कर चुनते हैं. 

एक्टिवली मैनेज्ड मल्टी फैक्टर फंड, क्वांट-आधारित रणनीतियों में एक पोर्टफोलियो मैनेजर की विशेषज्ञता और ज्ञान को मिलाकर, लंबी अवधि के लक्ष्य के लिए सही और संतुलित तरीके से मजबूत डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो का निर्माण करते हैं. 

(Disclaimer: यहां एनएफओ की थीम के बारे में जानकारी दी गई है, जो एक्सपर्ट से बात चीत के आधार पर है. इस थीम पर सलाह एक्सपर्ट के द्वारा दी गई है. यह फाइनेंशियल एक्सप्रेस के निजी विचार नहीं है. बाजार में जोखिम होते हैं, इसलिए निवेश के पहले एक्सपर्ट की राय लें.)

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