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नए लेबर कानून में 1 साल में ग्रेच्युटी मिलेगी या नहीं? कौन से नियम तुरंत हुए लागू और किस पर राज्यों के हाथ में फैसला

चारों नए लेबर कोड 21 नवंबर 2025 से लागू हो चुके हैं, लेकिन कई प्रावधानों को लेकर भ्रम बना हुआ है. कुछ बदलाव तुरंत लागू हैं, जबकि कुछ नियमों के अमल के लिए राज्यों की अधिसूचना का इंतजार है. यहां विस्तार से समझिए डिटेल

चारों नए लेबर कोड 21 नवंबर 2025 से लागू हो चुके हैं, लेकिन कई प्रावधानों को लेकर भ्रम बना हुआ है. कुछ बदलाव तुरंत लागू हैं, जबकि कुछ नियमों के अमल के लिए राज्यों की अधिसूचना का इंतजार है. यहां विस्तार से समझिए डिटेल

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Mithilesh Kumar Jha
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New Labour Code

केंद्र सरकार ने चार नए लेबर कोड को 21 नवंबर 2025 से लागू कर दिया है, लेकिन इनके लागू होने को लेकर अब भी भ्रम बना हुआ है. (Screenshot : YT/NarendraModi)

केंद्र सरकार चारों नए लेबर कोड को 21 नवंबर 2025 से लागू करने की घोषणा कर चुकी है, लेकिन इनमें किए गए कुछ खास बदलावों की वजह से कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति बन गई है. सबसे ज्यादा असमंजस ग्रेच्युटी से जुड़े नियमों को लेकर देखा जा रहा है. कई कर्मचारी यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या अब पांच साल की अनिवार्य सेवा की शर्त खत्म हो गई है और क्या सिर्फ एक साल की नौकरी के बाद ही ग्रेच्युटी का अधिकार मिल जाएगा, साथ ही यह बदलाव तुरंत लागू हुआ है या नहीं.

इस भ्रम को सरकार के संसद में दिए गए बयान ने और बढ़ा दिया है. सरकार ने कहा है कि वह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर लेबर कोड के सुचारु क्रियान्वयन पर काम कर रही है. इस बयान के बाद कई लोगों को यह लगने लगा है कि ग्रेच्युटी जैसे अहम लाभ अभी पूरी तरह जमीन पर लागू नहीं हुए हैं और फिलहाल प्रक्रिया के दौर में ही हैं, जिससे कर्मचारियों और कंपनियों दोनों के बीच स्थिति को लेकर सवाल बने हुए हैं.

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कानून को ध्यान से पढ़ने और विशेषज्ञों की राय लेने पर तस्वीर थोड़ी साफ होती है, लेकिन मामला उतना सीधा नहीं है जितना दिख रहा है. सरकार ने इस पर आधिकारिक तौर पर क्या कहा है, इसे समझना जरूरी है.

संसद में दिए गए लिखित जवाब में केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि चारों लेबर कोड 21 नवंबर 2025 से लागू हो चुके हैं. हालांकि इसके साथ सरकार ने यह भी जोड़ा कि श्रम मंत्रालय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर इनके सुचारु क्रियान्वयन पर काम कर रहा है.

इसका मतलब यह है कि कानून तो देशभर में लागू हो चुके हैं, लेकिन उनसे जुड़े कुछ व्यावहारिक और प्रक्रियागत पहलू अभी राज्यों के नियमों पर निर्भर हैं, जिन्हें लागू होने में थोड़ा वक्त लग सकता है.

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नए लेबर कोड में ग्रेच्युटी पर क्या नियम बदला? यहां समझिए

नए सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 के तहत ग्रेच्युटी के नियमों में एक अहम बदलाव किया गया है, जिसे लेकर सबसे ज्यादा गलतफहमी फैली है.

नए नियमों के मुताबिक फिक्स्ड-टर्म (निश्चित अवधि के कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले) कर्मचारियों को ग्रेच्युटी का हक मिलेगा, भले ही उन्होंने लगातार पांच साल की नौकरी पूरी न की हो. ऐसे कर्मचारियों को जितने साल या महीने उन्होंने काम किया है, उसी अनुपात (प्रो-राटा) में ग्रेच्युटी दी जाएगी.

हालांकि, रेगुलर यानी स्थायी कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी का पुराना नियम ही लागू रहेगा. यानी उन्हें अब भी कम से कम पांच साल की लगातार सेवा पूरी करनी होगी, तभी ग्रेच्युटी का हक मिलेगा.

यही फर्क सबसे अहम है, जिसे अक्सर लोग गलत समझ रहे हैं. ग्रेच्युटी का एक साल वाला नियम सभी कर्मचारियों पर लागू नहीं होता, बल्कि सिर्फ फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों के लिए है.

नया कानून लागू, लेकिन क्या एक साल में मिलेगी ग्रेच्युटी?

पहले दिन से कौन से नियम हुए लागू

लेबर लॉ से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रेच्युटी से जुड़ा कानूनी अधिकार पहले ही लागू हो चुका है.

TeamLease RegTech के CEO और को-फाउंडर ऋषि अग्रवाल बताते हैं कि जैसे ही लेबर कोड “लागू” होते हैं, उनके मुख्य प्रावधान तुरंत कानून बन जाते हैं. ग्रेच्युटी के मामले में इसका साफ मतलब यह है कि फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को प्रॉ-राटा आधार पर ग्रेच्युटी मिलने का हक कानून का हिस्सा है.

यह अधिकार राज्यों के नियमों पर निर्भर नहीं करता. राज्य सिर्फ भुगतान की प्रक्रिया, फॉर्म या समयसीमा तय कर सकते हैं, लेकिन ग्रेच्युटी का हक खत्म नहीं कर सकते.

सरल शब्दों में कहें तो फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को पांच साल पूरे होने से पहले भी ग्रेच्युटी मिलने का प्रावधान 21 नवंबर 2025 से कानून बन चुका है.

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राज्यों के हाथ में कौन से फैसले

हालांकि ग्रेच्युटी का कानूनी अधिकार मौजूद है, लेकिन इसे ज़मीन पर कैसे लागू किया जाएगा, यह काफी हद तक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा बनाए जाने वाले नियमों पर निर्भर करेगा. इनमें यह तय किया जाएगा कि भुगतान किस तरीके से होगा, कितने समय में किया जाएगा, कौन-कौन से फॉर्म और दस्तावेज़ लगेंगे, और विवाद होने पर जांच या समाधान की प्रक्रिया क्या होगी.

Grant Thornton Bharat में Global People Solutions के पार्टनर अखिल चंदना के मुताबिक, जिन प्रावधानों को अमल में लाने के लिए अलग-अलग नियमों की जरूरत होती है, वे तुरंत पूरी तरह लागू नहीं हो पाते. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नियोक्ताओं की कानूनी जिम्मेदारी टल जाती है—हक पहले से लागू है, सिर्फ उसकी प्रक्रिया धीरे-धीरे स्पष्ट होगी.

रेगुलर कर्मियों के लिए क्या बदला, क्या 5 साल वाला नियम खत्म?

सीधा जवाब है - नहीं. एक्सपर्ट साफ तौर पर कहते हैं कि यह दावा गलत है कि अब सभी कर्मचारियों को एक साल में ही ग्रेच्युटी मिलने लगेगी.

हकीकत यह है कि स्थायी (परमानेंट) कर्मचारियों के लिए पांच साल की लगातार सेवा का नियम पहले की तरह लागू रहेगा.
एक साल या उससे कम अवधि पर ग्रेच्युटी का फायदा सिर्फ फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को मिलेगा और वह भी प्रॉ-राटा आधार पर.

इस बदलाव का मकसद फिक्स्ड कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को बराबरी का अधिकार देना है, न कि पूरी वर्कफोर्स के लिए ग्रेच्युटी के नियमों को पूरी तरह बदल देना.

ग्रेच्युटी नियमों को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर नियोक्ता फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी के प्रावधान को नजरअंदाज करते हैं, तो आगे चलकर उन पर पिछली तारीख से भुगतान (रेट्रोस्पेक्टिव देनदारी) का बोझ पड़ सकता है.

क्योंकि सोशल सिक्योरिटी कोड पहले ही लागू हो चुका है, इसलिए कंपनियों को फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी की लागत अभी से अपने हिसाब-किताब में शामिल करनी चाहिए और HR व पेरोल सिस्टम की समीक्षा कर लेनी चाहिए. सिर्फ यह मानकर इंतजार करना कि “राज्यों के नियम अभी नहीं आए हैं”, बाद में महंगा साबित हो सकता है.

सिर्फ यह सोचकर कार्रवाई टालना कि “अभी राज्यों के नियम आना बाकी हैं”, आगे चलकर कंपनियों के लिए भारी पड़ सकता है.

21 नवंबर 2025 से क्या-क्या हो चुका है लागू

  • चारों लेबर कोड के तहत दी गई बुनियादी परिभाषाएं अब कानून बन चुकी हैं.
  • वेतन की एक समान परिभाषा तय कर दी गई है और 50 फीसदी वेज रूल लागू हो गया है.
  • सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाया गया है, जिसमें EPF, ESI, मातृत्व लाभ और ग्रेच्युटी शामिल हैं.
  • फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को सेवा अवधि के हिसाब से प्रॉ-राटा ग्रेच्युटी का अधिकार मिल गया है.
  • इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड के तहत छंटनी की सीमा बढ़ा दी गई है.
  • इसके साथ ही OSH कोड के तहत पेड लीव और कार्यस्थल की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान भी प्रभाव में आ चुके हैं.

इन नियमों पर फैसला बाकी

कुछ चीजें अभी राज्यों के नियमों पर निर्भर हैं, जैसे -

  • रजिस्ट्रेशन और लाइसेंसिंग की प्रक्रियाएं
  • इंस्पेक्शन सिस्टम और उसके तरीके
  • अलग-अलग फॉर्म, रिटर्न और कंप्लायंस फॉर्मेट
  • राज्यों के हिसाब से तय होने वाली सीमाएं और प्रक्रियाएं

स्मूद इंप्लिमेंटेशन (smooth implementation) के क्या है असल मायने

जब केंद्र सरकार कहती है कि वह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ “सुचारु क्रियान्वयन” पर काम कर रही है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि कानून लागू नहीं हुए हैं. इसका सीधा अर्थ यह है कि कानूनी ढांचा पूरी तरह लागू है और अब राज्यों से उम्मीद की जा रही है कि वे जल्दी से नियम जारी करें, ताकि इन कानूनों का पालन करना आसान हो सके. तब तक जहां नए लेबर कोड से टकराव नहीं होता, वहां पुरानी प्रक्रियाएं अंतरिम व्यवस्था के तौर पर चलती रहेंगी.

कर्मचारियों और नियोक्ताओं के लिए क्या समझना जरूरी है

सीधी और साफ बात यह है कि चारों लेबर कोड 21 नवंबर 2025 से लागू हो चुके हैं. इसी तारीख से फिक्स्ड टर्म (निश्चित अवधि) पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी का अधिकार भी कानूनी रूप से लागू हो गया है. वहीं, रेगुलर या स्थायी कर्मचारियों के लिए पांच साल की ग्रेच्युटी की शर्त में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

राज्य सरकारें यह तय करेंगी कि ग्रेच्युटी कैसे, कब और किस प्रक्रिया से दी जाएगी, लेकिन यह सवाल अब नहीं है कि ग्रेच्युटी देनी है या नहीं.

नियोक्ताओं के लिए विशेषज्ञों की सलाह है कि वे “देखते हैं बाद में” वाला रवैया न अपनाएं और अभी से अपने HR व पेरोल सिस्टम को नए नियमों के मुताबिक तैयार करें. वहीं फिक्स्ड टर्म पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह बदलाव सोशल सिक्योरिटी के दायरे में एक बड़ा विस्तार है, भले ही इसका पूरी तरह जमीनी स्तर पर लागू होना थोड़ा समय ले.

Note: This content has been translated using AI. It has also been reviewed by FE Editors for accuracy.

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