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RBI New Guidelines 2026: बैंकों और NBFC के लिए प्रमोटर और संबंधित पक्षों को कर्ज देने पर लागू होंगे सख्त नियम. (AI Generated Image)
RBI New Guidelines 2026, New Credit Risk Management Rules : भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI ने बैंकों और नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFC) के लिए ‘रिलेटेड पार्टी लेंडिंग’ से जुड़े मामलों के लिए नए और सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं. क्रेडिट रिस्क मैनेजमेंट (Credit Risk Management) से जुड़े इन दिशानिर्देशों का मकसद साफ है - बैंकों और वित्तीय संस्थानों में हितों के टकराव को रोकना, पारदर्शिता बढ़ाना और कॉरपोरेट गवर्नेंस को मजबूत करना. ये नए नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे, लेकिन मौजूदा कर्जों को उनकी मैच्योरिटी तक जारी रखने की छूट दी गई है. इन नियमों का असर बैंकिंग सिस्टम की सेहत और भरोसे दोनों पर पड़ेगा.
क्यों जरूरी थे नए नियम
पिछले कुछ सालों में यह सवाल बार-बार उठता रहा है कि कहीं बैंक और गैर-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (Non Banking Financial Companies) अपने ही प्रमोटर्स, बड़े शेयरहोल्डर्स या उनसे जुड़ी कंपनियों को फायदा तो नहीं पहुंचा रहे हैं. RBI का मानना है कि ऐसे लेनदेन से हितों का टकराव (Conflicts of Interest) पैदा होता है और रिस्क भी बढ़ता है. इसलिए नए नियमों के जरिए यह पक्का किया जा रहा है कि कर्ज देने का फैसला पूरी तरह प्रोफेशनल ढंग से हो, न कि रिश्तों के आधार पर.
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प्रमोटर्स और बड़े शेयरहोल्डर्स को कर्ज पर रोक
नए दिशानिर्देशों के तहत बैंक अब अपने ही प्रमोटर्स, उनके रिश्तेदारों और 10 फीसदी या उससे ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाले शेयरहोल्डर्स को सीधे कर्ज नहीं दे सकेंगे. इतना ही नहीं, जिन संस्थाओं पर इन लोगों का कंट्रोल या असर है, उन्हें भी कर्ज देने पर पाबंदी रहेगी. हालांकि, ऐसे गैर-रणनीतिक संस्थागत निवेश को इस नियम के दायरे से बाहर रखा गया है, जिनमें शेयरहोल्डर का कंट्रोल नहीं है.
बोर्ड की भूमिका और मंजूरी की प्रक्रिया
RBI ने साफ किया है कि हर बैंक और NBFC को ‘रिलेटेड पार्टी लेंडिंग’ के लिए बोर्ड से मंजूर की स्पष्ट पॉलिसी बनानी होगी. इस पॉलिसी में कुल लिमिट (Aggregate Limit) और सब-लिमिट्स (Sub Limits) तय करनी होंगी. बड़े कर्ज के मामलों में सीधे बोर्ड या बोर्ड की विशेष समिति से मंजूरी लेना जरूरी होगा. बड़े बैंकों में 25 करोड़ रुपये, मिड साइज बैंकों में 10 करोड़ रुपये और छोटे बैंकों में 5 करोड़ रुपये से ऊपर के कर्ज इसी दायरे में आएंगे.
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हितों के टकराव से बचने का कड़ा इंतजाम
अगर किसी डायरेक्टर, सीनियर मैनेजमेंट या अहम जिम्मेदारी निभा रहे कर्मचारियों का अपना या उनके रिश्तेदारों का मामला है, तो वे उस कर्ज से जुड़े फैसलों में हिस्सा नहीं ले सकेंगे. चाहे वह कर्ज को मंजूरी देने की बात हो, शर्तों में बदलाव हो या सेटलमेंट का मामला. RBI का मानना है कि सिस्टम में भरोसा बनाए रखने और हितों के टकराव (Conflicts of Interest) से बचने के लिए ऐसा करना जरूरी है.
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निगरानी, रिपोर्टिंग और डिसक्लोजर
बैंकों और NBFC को निगरानी, रिपोर्टिंग और खुलासे (Financial Statements, Presentation and Disclosures) से जुड़े नए नियम भी जारी किए हैं, जिनके तहत संबंधित पक्षों को दिए गए कर्जों यानी ‘रिलेटेड पार्टी लेंडिंग’ की अपडेटेड सूची रखनी होगी. हर तिमाही में यह जांच होगी कि नियमों का पालन हो रहा है या नहीं. किसी भी तरह की गड़बड़ी या पॉलिसी से हटकर लिया गया फैसला ऑडिट कमेटी को बताना होगा. इसके अलावा, कर्मचारियों को दिए गए कर्ज का सालाना खुलासा भी जरूरी होगा.
पुराने ट्रांजैक्शन को शर्तों के साथ मिली राहत
RBI ने यह भी स्पष्ट किया है कि जो पुराने रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन नए नियमों के मुताबिक नहीं हैं, वे अपनी मैच्योरिटी तक चल सकते हैं. लेकिन इन्हें न तो रिन्यू किया जा सकेगा, न शर्तें बदली जा सकेंगी और न ही रकम बढ़ाई जा सकेगी.
इक्विटी निवेश शामिल नहीं
संबंधित पक्षों के डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश को ‘रिलेटेड पार्टी लेंडिंग’ से जुड़े इन दिशानिर्देशों के दायरे में रखा गया है. लेकिन इक्विटी में निवेश को इसमें शामिल नहीं किया गया है. यानी शेयर में निवेश पर ये नियम लागू नहीं होंगे.
नियम तोड़ने पर सख्त कार्रवाई
RBI ने साफ चेतावनी दी है कि नियमों की अनदेखी करने या घुमा-फिराकर उनसे बचने की कोशिशों पर कड़ी कार्रवाई होगी. इसमें जुर्माना, फॉरेंसिक ऑडिट से लेकर बिजनेस पर पाबंदियां लगाने जैसे कदम शामिल हैं.
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