/financial-express-hindi/media/media_files/2025/05/25/3v5SAB2rF5rDgWZeMKp1.jpg)
Bond investment India : सुरक्षा की असली गारंटी बॉन्ड जारी करने वाली कंपनी की क्रेडिट रेटिंग पर निर्भर करती है. (FE File)
RBI Rate Cuts & Rising Bond Market, The Perfect Time to Invest in Bonds : भारत में सेंट्रल बैंक आरबीआई द्वारा लगातार 5वें रेट कट के बाद अब रेपो रेट 5.25 फीसदी पर आ गया है. वहीं यूएस फेड ने भी 11 दिसंबर को 25 बेसिस प्वॉइंट रेट कट किया है. रेट कट के इस दौर में बॉन्ड मार्केट का सपोर्ट मिलने की पूरी उम्मीद है. ब्याज दरें जब नीचे जाती हैं तो बॉन्ड मार्केट में तेजी की उम्मीद की जाती है. ऐसे में अभी पोर्टफोलियो को बॉन्ड के जरिए डाइवर्सिफाइड करने का अच्छा मौका है. वैसे सिर्फ रेट ही नहीं और भी कुछ वजह हैं, जिसके चलते आप बॉन्ड में निवेश पर विचार कर सकते हैं.
सोना अभी और चमकेगा, ग्लोबल उथल पुथल के बीच 2026 में शेयर बाजार बना रहेगा मजबूत : Report
पैसा बाजार की सीईओ संतोश अग्रवाल का कहना है कि इन्वेस्टमेंट मार्केट में बॉन्ड्स एक ऐसे विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, जिन्हें अब तक रिटेल निवेशकों ने काफी हद तक नजरअंदाज किया है. पिछले कुछ साल में कॉर्पोरेट बॉन्ड (Corporate Bonds) मार्केट तेजी से बढ़ा है. बदलते आर्थिक माहौल, स्थिर आय (Income) की जरूरत और बेहतर रिटर्न के विकल्प तलाशते निवेशकों के लिए बॉन्ड अब एक जरूरी एसेट क्लास बनते जा रहे हैं. ये न सिर्फ पोर्टफोलियो में स्थिरता लाते हैं, बल्कि कई मामलों में बैंक एफडी और छोटी बचत योजनाओं से बेहतर रिटर्न भी देते हैं. इनमें निवेश के पीछे और भी कुछ वजह हो सकती हैं.
रेगुलर और अनुमानित इनकम
जहां इक्विटी निवेश मार्केट के उतार–चढ़ाव पर निर्भर रहता है, वहीं बॉन्ड्स निवेशकों को निश्चित और अनुमानित आय देते हैं. बॉन्ड्स पर मिलने वाला ब्याज (कूपन रेट) शुरुआत में ही तय हो जाता है और मैच्योरिटी तक स्थिर रहता है. इससे निवेशकों को फाइनेंशियल प्लानिंग बेहतर तरीके से करने में मदद मिलती है. यह विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों, कम जोखिम लेने वालों और स्थिर आय चाहने वाले निवेशकों के लिए एक भरोसेमंद विकल्प है.
रिस्क ले सकते हैं? या बिल्कुल नहीं, आपके पास किस तरह की हेनी चाहिए म्यूचुअल फंड स्कीम
कैपिटल प्रिजर्वेशन यानी पूंजी की सुरक्षा
बॉन्ड्स की मैच्योरिटी पर निवेशक को उसकी फेस वैल्यू वापस मिलती है, जिससे पूंजी की सुरक्षा बनी रहती है. यह उन लोगों के लिए बेहद उपयुक्त है जो अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखना चाहते हैं. हालांकि, सुरक्षा की असली गारंटी बॉन्ड जारी करने वाली कंपनी की क्रेडिट रेटिंग पर निर्भर करती है. इसलिए हाई क्रेडिट रेटिंग वाले बॉन्ड्स चुनें, ताकि जोखिम कम रहे और पूंजी सुरक्षित बनी रहे.
पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन
हर एसेट क्लास एक जैसा प्रदर्शन नहीं करता. जब इक्विटी मार्केट में गिरावट आती है, उस समय बॉन्ड आमतौर पर स्थिर रहते हैं और नियमित इंटरेस्ट इनकम भी देते हैं. इस वजह से पोर्टफोलियो में इक्विटी और बॉन्ड्स का सही मिश्रण रखने से लंबे समय में रिटर्न को संतुलित किया जा सकता है.
बैंक FD और स्मॉल सेविंग्स से ज्यादा फायदा
आज के समय में इन्वेस्टमेंट-ग्रेड बॉन्ड्स बैंक FD की तुलना में बेहतर रिटर्न दे रहे हैं. जहां बैंक एफडी में 6.25% से 7.50% तक ब्याज है, वहीं कई कॉर्पोरेट बॉन्ड डबल डिजिट तक यील्ड दे रहे हैं. यह रिटेल निवेशकों को महंगाई को मात देने का मौका देता है.
कैपिटल गेंस
बॉन्ड्स सिर्फ ब्याज ही नहीं देते, इनसे कैपिटल गेंस भी कमाया जा सकता है. अगर बाजार में बॉन्ड की कीमत बढ़ जाए तो निवेशक उसे खरीद कीमत से ज्यादा पर बेच सकते हैं. खासतौर पर जब ब्याज दरें घटती हैं, तब पुराने ज्यादा कूपन रेट वाले बॉन्ड्स की कीमत बढ़ जाती है.
Ashish Kacholia Portfolio : आशीष कचोलिया पोर्टफोलियो के 5 लूजर, इस साल 63% तक आई है गिरावट
कम राशि के साथ निवेश की सुविधा
सरकारी बॉन्ड 100 रुपये फेस वैल्यू पर और कॉर्पोरेट बॉन्ड आमतौर पर 1,000 रुपये या 10,000 रुपये से खरीदे जा सकते हैं. SEBI ने भी रिटेल भागीदारी बढ़ाने के लिए न्यूनतम निवेश राशि कम की है.
(Disclaimer: यहां हमने एक्सपर्ट से बात चीत के आधार पर जानकारी दी है. यह फाइनेंशियल एक्सप्रेस के निजी विचार नहीं है. बाजार में जोखिम होते हैं, इसलिए निवेशक निवेश का कोई फैसला लेने के पहले एक्सपर्ट की राय लें.)
/financial-express-hindi/media/agency_attachments/PJD59wtzyQ2B4fdzFqpn.png)
Follow Us