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जहाँ सचिन ने 16 साल की उम्र में पाकिस्तान के खिलाफ डेब्यू किया वहीं कांबली को मौका मिलने में तीन और साल लग गए.
हर भारतीय बच्चा जिसने कभी क्रिकेट बैट पकड़ा है, वह सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar)का नाम भी जानता है. लेकिन कोई भी उस दूसरे लड़के विनोद कांबली को याद नहीं रखता जो उसके साथ तब खड़ा था जब दुनिया ने पहली बार वो 664 रन की साझेदारी देखी थी.
दो लड़के, एक ही स्कूल, एक ही कोच, एक ही साझा सपना. विडम्बना तो देखिए- एक बन गया ‘क्रिकेट का भगवान’ और दूसरा आज भी याद दिलाता है कि केवल प्रतिभा ही सफलता की गारंटी नहीं होती.
शारदाश्रम से क्रिकेट की दुनिया तक
1980 के दशक के अंत तक, मुंबई का शिवाजी पार्क भारतीय क्रिकेट का जन्मस्थल था. कोच रमाकांत आचरेकर की सीटी हर सुबह वहां गूंजती थी. उनके शिष्यों में दो खास लड़के हुआ करते थे – बांद्रा के सचिन रमेश तेंदुलकर और कंजुरमार्ग के विनोद गणपत कांबली.
कांबली छोटे चॉल से निकले थे, उनके पिता मिस्त्री थे और सात लोगों का पेट भरना उनका संघर्ष था. फिर भी हर सुबह विनोद अपने क्रिकेट किट के साथ भरी लोकल ट्रेन में सफर करता और नेट्स तक पहुँचता. उसका हर शॉट, हर रन उस भूख का इज़हार था जो हर हाल में अपनी तक़दीर बदलना चाहता था.
वो भूख सचिन के अनुशासन से मेल खाई और फिर साथ में वे दोनों अनस्टॉपेबल बन गए. जिस दिन शारदाश्रम विद्यामंदिर के लिए उन्होंने 664 रन जोड़े, स्कूल का मैदान एक महोत्सव बन गया. कांबली ने 349 रन बनाए. और, जैसे यह उनके लिए कम था उन्होंने 37 रन देकर छह विकेट भी लिए. उस वक़्त ऐसा लगता था जैसे दो बच्चे, एक सपना लिए हुए हैं और ये एक अटूट दोस्ती है जो किसी के कोशिश करने पर भी नहीं टूटेगी.
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लिफ्ट और सीढ़ी : दो अलग रास्ते पर एक ही जूनून
कांबली ने एक बार कहा था, “सचिन ने लिफ्ट ली, मैं सीढ़ियाँ चढ़ता रहा.”
यह सुनने में तो चतुर लाइन लगी, लेकिन इसके पीछे एक गहरी सच्चाई थी.
सचिन ने 16 साल की उम्र में पाकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू किया जबकि कांबली को मौका मिलने में तीन और साल लग गए. और, जब उसे आखिरकार मौका मिला उसने धमाका कर दिया. दो डबल सेंचुरी, एक मुंबई में इंग्लैंड के खिलाफ और दूसरी जल्द ही ज़िम्बाब्वे के खिलाफ उनके बल्ले से निकलीं. अपने पहले सात टेस्ट मैचों में उसने 793 रन बनाए और 113.2 का औसत रिकॉर्ड कायम किया.
वो भारत का अगला बड़ा सितारा लगता था. एक ऐसा लेफ्ट-हैंडर, जिसमें स्टाइल, ताकत और बेधड़क हिम्मत का मेल था. गेंदबाज उसके कट और ड्राइव से कांपते थे. एक बार तो उसने शेन वार्न के एक ओवर में 22 रन मार दिए.
लेकिन उस दौर का भारतीय क्रिकेट शायद विनोद कांबली जैसे किसी खिलाडी के लिए तैयार नहीं था.
वो पतन जिसे हर कोई देख रहा था
कांबली ने 17 टेस्ट खेले. 1084 रन बनाए. औसत था 54.2 का. यह किसी भी भारतीय का अब तक का सबसे ऊँचा औसत था जिसने टेस्ट में हजार रन पूरे किए हों. फिर भी उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया और कभी वापसी नहीं हुई.
कारण? कुछ कहते थे कि उन्हें शॉर्ट बॉल के खिलाफ मुश्किल होती थी. कुछ लोग उनकी लाइफस्टाइल की बातें करते – सुनहरी चेन, देर रात तक की मस्ती और ऐसा एटीट्यूड जो सेलेक्टर्स को पसंद नहीं आया. उस समय का भारतीय क्रिकेट जो अब भी परंपरावादी था, शोर-शराबे वाले बागियों के बजाय शांत और सभ्य खिलाड़ियों को तरजीह देता था.
लेकिन इसके पीछे एक और वजह भी थी. कांबली उस घराने से आते थे जहाँ जीना ही अपने आप में एक लड़ाई होती थी. अचानक मिली प्रसिद्धि उन पर बाढ़ की तरह आई – तेज़, ज़ोरदार और भारी रूप में. और वह इसमें संभलना नहीं सीख पाए.
जब रोशनी बुझ गई, कैमरे हट गए और फोन बंद हो गया, उसे समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करे. 1996 के वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में भारत के हारने के बाद वह लाइव टीवी पर रो पड़ा था. लोग उसका मज़ाक उड़ाते रहे, लेकिन बहुत कम लोग जानते थे कि उस समय उसका ODI औसत तेंदुलकर, अजहर या जडेजा से भी ज़्यादा था.
उस दिन, जब वह ईडन गार्डन्स के मैदान से आंसुओं के साथ बाहर चला गया, वह तब भी आँकड़ों के हिसाब से भारत का एक बेहतरीन ODI बल्लेबाज था. लेकिन आंकड़े हमेशा आपको भुलाए जाने से नहीं बचाते.
जीवन भर कांबली की तुलना तेंदुलकर से की गई. यह कभी बराबरी की लड़ाई नहीं थी. सचिन शांत, संयमित और केंद्रित थे. कांबली भावुक, आवेगी और बेचैन.
फिर भी, दोनों एक-दूसरे को भाई की तरह प्यार करते थे.
जब कांबली को 2013 में दो हार्ट अटैक हुए, तो यह सचिन थे जिन्होंने चुपचाप उनके मेडिकल बिल्स भरे. लेकिन सालों पहले, 2009 में उनकी दोस्ती में दरार आ गई थी. कांबली परेशान और नाराज़, एक रियलिटी शो में कह गए कि सचिन “उनकी और मदद कर सकते थे.” यह दोनों के लिए बहुत दर्दनाक था. सचिन ने अपनी रिटायरमेंट स्पीच में उनका नाम तक नहीं लिया. तीन साल तक उन्होंने एक-दूसरे से बात नहीं की.
आखिरकार, तेंदुलकर ने उन्हें अपनी मिडलसेक्स ग्लोबल अकादमी में एक भूमिका देने का प्रस्ताव दिया. पुराने जख्म भले ही पूरी तरह न भरे हो, पर कुछ हद तक भर गए.
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गुमनाम आँकड़े
कांबली के आँकड़े आज भी उनके लिए जोर से बोलते हैं.
टेस्ट क्रिकेट में: 1084 रन, औसत 54.2 – यह उन सभी भारतीय बल्लेबाज़ों में सबसे ऊँचा औसत है जिन्होंने टेस्ट में 1000 रन पूरे किए.
ODI में: 2477 रन, औसत 32.59 लेकिन 1996 वर्ल्ड कप के अंत में, उनका औसत 40.78 था. उस समय यह सभी भारतीय बल्लेबाज़ों में दूसरा सबसे ऊँचा औसत था.
फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में: 9965 रन, औसत 59.67 – यह रिकॉर्ड दुनिया के केवल पांच खिलाड़ियों ने ही पार किया है.
ये कोई असफलता के आँकड़े नहीं हैं. ये उस आदमी के आँकड़े हैं, जो बड़ी तेजी से चमका लेकिन बहुत जल्दी बुझ गया.
क्रिकेट से अलग एक दुनिया
क्रिकेट के बाद, कांबली ने सब कुछ आज़माया – अनर्थ और पल पल दिल के साथ जैसी फिल्मों में अभिनय किया, कमेंट्री की और यहां तक कि राजनीति भी की. लेकिन कुछ भी सही नहीं बैठा. वापसी की उम्मीद में वह 30 साल की उम्र में भी दक्षिण अफ्रीका की डोमेस्टिक लीग में बोलैंड के लिए खेले. यह मानते हुए कि वह फिर से लौट सकते हैं, वह कभी नहीं रुके. यही विश्वास फिर चाहे वह सही हो या गलत, यही एक चीज़ थी जो उनके साथ कांस्टेंट रही.
वो लड़का जिसके लिए सिर्फ़ टैलेंट काफी नहीं था
विनोद कांबली की कहानी सिर्फ़ खोई हुई प्रतिभा की कहानी नहीं है. यह बताती है कि कभी-कभी केवल टैलेंट ही काफी नहीं होता, कई बार जिंदगी आपसे धैर्य, समझदारी और संयम जैसी चीज़ें भी मांगती है.
उसके पास बड़े सपोर्ट सिस्टम या आरामदायक जीवन नहीं था. उसके पास था एक दिल, कुछ जज़्बात और थोड़ी सी अनुसाशनहीनता.
सचिन और विनोद दरअसल एक ही सपने के दो पहलू थे एक बन गया पूर्णता का प्रतीक. दूसरा बन गया एक सबक कि जब जिंदगी बहुत जल्दी मोड़ ले ले तो क्या होता है.
फिर भी कहीं मुंबई की भीड़-भाड़ वाली लोकल ट्रेनों में शायद कोई और बच्चा भी है जो फटा हुआ किट बैग लेकर, 664 रन की साझेदारी का सपना देख रहा है और उस सपने के लिए सचिन और विनोद दोनों की ही अहमियत बराबर है.
Note: This content has been translated using AI. It has also been reviewed by FE Editors for accuracy.
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