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कहीं आपकी यादें भी तो 'नंबरों का खेल' बनकर नहीं रह गईं? जानें डिजिटल सुरक्षा का सच

2000 के दशक की शुरुआती डिजिटल यादें खराब तकनीक और बंद होती वेबसाइटों के कारण "डिजिटल ब्लैक होल" में खो गईं. भविष्य बचाने के लिए सिर्फ फोन पर भरोसा न करें; अपनी फोटो को क्लाउड और हार्ड डिस्क जैसी कई जगहों पर बैकअप रखें.

2000 के दशक की शुरुआती डिजिटल यादें खराब तकनीक और बंद होती वेबसाइटों के कारण "डिजिटल ब्लैक होल" में खो गईं. भविष्य बचाने के लिए सिर्फ फोन पर भरोसा न करें; अपनी फोटो को क्लाउड और हार्ड डिस्क जैसी कई जगहों पर बैकअप रखें.

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FE Hindi Desk
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The Digital Memory Crisis

पुराने कंप्यूटर, खराब सीडी और बंद हुई वेबसाइटों ने एक पूरी पीढ़ी का डिजिटल इतिहास मिटा दिया है. सिर्फ गूगल फोटोज पर भरोसा करना आपकी यादों के लिए खतरनाक हो सकता है. Photograph: (AI generated)

यदि आपका जन्म 1990 के दशक या उससे पहले हुआ था, तो क्या आपके पास अभी भी 1990 के दशक में ली गई अपनी डिजिटल तस्वीरें सुरक्षित हैं? वह युग जब दुनिया ने पुरानी फिजिकल फिल्म-आधारित फोटोग्राफी को छोड़ना शुरू ही किया था और शुरुआती डिजिटल कैमरों को अपनाना शुरू किया था, कई लोगों के लिए वह यादें शायद समय के साथ कहीं खो गई होंगी और 2000 के दशक की शुरुआत में उन्हें वापस लाने का कोई तरीका नहीं बचा होगा. वे तस्वीरें और यादें, जो तत्कालीन नए कॉम्पैक्ट कैमरों से बड़े उत्साह के साथ ली गई थीं और हार्ड ड्राइव या अब बंद हो चुकी ऑनलाइन स्टोरेज सर्विसेज पर स्टोर की गई थीं, शायद हमेशा के लिए गायब हो गई हैं. विशेषज्ञ इस युग को "डिजिटल ब्लैक होल" के रूप में वर्णित करते हैं, जहां तेजी से होते तकनीकी बदलावों और रिलाएबल प्रिजर्वेशन मेथड्स की कमी के कारण एक पूरी पीढ़ी की विजुअल हिस्ट्री खो गयी है.

बीबीसी पर अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करने वाली लेखिका जूलिया बेंसफील्ड लूस के अनुसार, वह अपने एक महत्वपूर्ण जन्मदिन के लिए अपनी सभी तस्वीरें जमा करना चाहती थीं, लेकिन उस दौर की केवल मुट्ठी भर तस्वीरें ही सामने आ पाईं. जूलिया का कहना है कि बाकी तस्वीरें उनके क्रैश हो चुके लैपटॉप, भूले हुए USB ड्राइव और लंबे समय से बंद पड़ी ऑनलाइन सेवाओं के इन एक्सेसिबल एकाउंट्स की भेंट चढ़ गईं.

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प्रोफेशनल फोटो ऑर्गेनाइजर्स भी अपने क्लाइंट्स से इसी तरह की कहानियां सुनते हैं, जिनमें अक्सर परिवार के उन खास पलों की इमोशनल डिस्कवरीज शामिल होती है जिन्हें अब दोबारा न देखा जा सकता है, न एक्सेस किया जा सकता है.

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2000 का दशक: डिजिटल क्रांति और यादों की तबाही का दौर

फिल्म से डिजिटल कैमरों की ओर बदलाव 2005 के आसपास बहुत तेजी से बढ़ा और 2010 में इनकी बिक्री अपने शिखर पर पहुंच गई, लेकिन 2007 में आईफोन (iPhone) की शुरुआत के बाद इसमें भारी गिरावट आई. लोगों ने पहले की तुलना में कहीं अधिक तस्वीरें खींचीं, लेकिन उस समय स्टोरेज के विकल्प काफी कमजोर थे, जैसे कि मेमोरी कार्ड, सीडी (CD), यूएसबी स्टिक/पेनड्राइव और पर्सनल कंप्यूटर. ये सभी चीज़ें ऐसी थीं जो आसानी से चोरी हो सकती थीं, उनमें वायरस आ सकता था या वे कभी भी खराब हो सकती थीं.

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ऑनलाइन प्लेटफॉर्म: मुफ्त और सुविधाजनक, लेकिन टिकाऊ नहीं

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने सुविधा का वादा तो किया मायस्पेस (MySpace), कोडक ईजीशेयर (Kodak EasyShare), शटरफ्लाई (Shutterfly) और स्नैपफिश (Snapfish) जैसी साइटों ने मुफ्त अपलोड की सुविधा दी लेकिन इनमें से कई टिकाऊ साबित नहीं हुए. मायस्पेस ने 2019 में सर्वर माइग्रेशन के दौरान अपने यूजर्स का 12 साल का डेटा खो दिया, जो कि काफी चर्चा में रहा था. शटरफ्लाई जैसी अन्य साइटों ने फाइलों को 'पेवॉल' (paywall) के पीछे आर्काइव कर दिया, यानी डाउनलोड करने के लिए बार-बार कुछ न कुछ खरीदना जरूरी कर दिया. रिटेल एनालिस्ट सुचरित्रा कोडाली के अनुसार, उपभोक्ता "मुफ्त इंटरनेट की चमक-धमक में खो गए" थे और उन्होंने कभी इनके लंबे समय तक चलने पर सवाल नहीं उठाया.

व्यवहार से जुड़े कारणों ने भी इस समस्या को और बढ़ा दिया. फोटो मैनेजमेंट एक्सपर्ट कैथी नेल्सन बताती हैं कि लोगों ने डिजिटल फाइलों को स्थायी फिजिकल प्रिंट की तरह समझा और उनकी संवेदनशीलता को नहीं पहचाना. वे कहती हैं, "हमें लगता है कि हम एक असली तस्वीर देख रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. हम केवल नंबरों का एक समूह (bunch of numbers) देख रहे होते हैं." नियमित बैकअप जैसी आदतों के बिना, अलग-अलग डिवाइसों में बिखरी हुई तस्वीरें अपग्रेड या शिफ्टिंग के दौरान आसानी से खो गईं.

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डिजिटल फोटोग्राफी के भविष्य को कैसे सुरक्षित रखें

हालांकि 2000 के दशक की शुरुआत में हुए नुकसान की भरपाई अब नामुमकिन है, लेकिन विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि आज की तस्वीरें भी कंपनियों के बंद होने, साइबर हमलों या आपदाओं के कारण खतरे में हैं. इनके संरक्षण की कुंजी व्यक्तिगत जिम्मेदारी और 'रिडंडेंसी' (यानी एक से ज्यादा बैकअप) में छिपी है.

फोटो मैनेजर्स बैकअप के लिए "3-2-1" नियम की सलाह देते हैं, यानी हर तस्वीर की तीन कॉपियां रखें, जो दो अलग-अलग तरह के मीडिया (जैसे क्लाउड स्टोरेज और एक एक्सटर्नल ड्राइव) पर हों, और एक कॉपी अपने घर से दूर किसी दूसरी जगह पर रखें, जैसे कि किसी रिश्तेदार के घर. गूगल फोटोज जैसी सेवाओं पर ऑटोमैटिक बैकअप के साथ-साथ हर महीने एक्सटर्नल ड्राइव में डेटा सेव करने से बोझ कम हो सकता है. साथ ही रोज़ाना फोटो एडिटिंग (गैर-ज़रूरी फोटो हटाना) की आदत तस्वीरों की बढ़ती संख्या को मैनेज करने में मदद करती है.

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आखिर में, जैसा कि नेल्सन सावधान करती हैं, "आज हम उस दौर से कहीं ज़्यादा खतरे में हैं जब फोटो सिर्फ कागज पर छपी होती थीं." अगर हम आज ही सही कदम उठाएं, तो हम यह पक्का कर सकते हैं कि हमारी आज की यादें पुराने डिजिटल दौर की उन तस्वीरों की तरह गायब न हो जाएं जिन्हें अब कभी नहीं देखा जा सकता.

Note: This content has been translated using AI. It has also been reviewed by FE Editors for accuracy.

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