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कनाडा में कॉर्पोरेट जॉब की हकीकत: बिना पर्मानेंट रेजीडेंसी के सिर्फ 1% चांस, शाश्वत की कहानी से समझें जमीनी हालात. Photograph: (shashwatkhr)
कनाडा से वापस आने के लगभग डेढ़ साल बाद भी, शाश्वत खुद को बार-बार उसी सवाल का जवाब देते हुए पाते हैं: "आप वापस क्यों आए?" इस पर विराम लगाने के लिए इस भारतीय पेशेवर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए अपने फैसले को समझाने का फैसला किया, जिसे कई लोगों ने काफी व्यावहारिक और खुद से जुड़ा हुआ पाया.
जैसे-जैसे अमेरिका जैसे देश वीज़ा नियमों को सख्त बना रहे हैं, ब्रिटेन बाहर से आने वालों पर सख्ती कर रहा है और कनाडा 2025 में इंटरनेशनल स्टूडेंट्स के लिए बड़े बदलाव ला रहा है उससे साफ दिख रहा है कि अब दुनिया भर में माइग्रेशन को लेकर माहौल बदल चुका है. पिछले एक साल में इस स्थिति ने बहुत से अप्रवासी भारतीयों (NRIs) को भारत लौटने के लिए प्रेरित किया है. कई लोगों का मानना है कि वापस आने की एक बड़ी वजह यह भी है कि अब भारत में तरक्की के असली मौके मिल रहे हैं, खासकर टेक (Tech) की दुनिया में.
कनाडा में नौकरी मिलना क्यों हुआ मुश्किल?
एक सोशल मीडिया पोस्ट में, शाश्वत ने बताया कि उनकी वापसी का पहला और सबसे बड़ा कारण 'काम' था. उनके अनुसार, यदि आपके पास स्थायी निवास (पर्मानेंट रेजीडेंसी) नहीं है, तो कनाडा में कॉर्पोरेट नौकरियां मिलना बेहद कठिन है. उन्होंने कहा, "कनाडा के कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरियां नहीं हैं. अगर आपके पास पर्मानेंट रेजीडेंसी नहीं है, तो आपके चयन की संभावना केवल एक या दो प्रतिशत ही रह जाती है." उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि भले ही लोग यह मानते हों कि वहां नौकरियां आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बहुत अलग है.
शाश्वत ने अपना खुद का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने कनाडा में उसी कंपनी के लिए इंटरव्यू दिया था, जिसमें वे अभी भारत में काम कर रहे हैं. सब कुछ ठीक था, स्किल्स भी वही थे, फिर भी कनाडा में उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया. उनका मानना है कि इसकी वजह एकदम साफ थी. उनके पास वहां की पर्मानेंट रेजीडेंसी नहीं थी.
उन्होंने आगे बताया कि कनाडा में उन्हें जिस तरह के काम मिल रहे थे, वे वैसे नहीं थे जिनके लिए वो विदेश गए थे. शाश्वत ने कहा, "मैं वहां उन कामों को करने के लिए नहीं गया था." कई अन्य लोगों की तरह, वह भी भारत से बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद में कनाडा गए थे. लेकिन वहां रहने के बाद उन्हें अहसास हुआ, "मैं तो भारत में पहले से ही उनसे बेहतर ज़िंदगी जी रहा था." उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिस 'सपनों वाली लाइफ' की उम्मीद में लोग विदेश जाते हैं, वहां तक पहुंचने में अक्सर 8 से 10 साल का कड़ा संघर्ष लग जाता है.
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अपनों से दूर रहकर समझ आती है परिवार की अहमियत
वापसी की दूसरी बड़ी वजह उनका परिवार था. शाश्वत ने बताया कि कई भारतीय युवाओं को लगता है कि विदेश जाने से उन्हें आज़ादी और इंडिपेंडेंस मिलेगी. लेकिन अकेले रहने के छह महीने के भीतर ही उनकी सोच बदल गई. उन्होंने कहा, "भारत में परिवार के बीच झगड़े, बहस और नोंक-झोंक होती रहती है, लेकिन फिर भी वही सबसे अच्छी लाइफ है." उन्होंने समझाया कि अकेले रहने पर अहसास होता है कि परिवार के सपोर्ट के बिना ज़िंदगी कितनी खाली हो सकती है. उन्होंने बस इतना कहा, "अकेले रहने में कोई मज़ा नहीं है."
शाश्वत ने यह साफ़ किया कि कनाडा में ऐसी कई चीज़ें हैं जिनके लिए भारत आज भी संघर्ष कर रहा है. उन्होंने वहां के शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर, साफ़-सफाई, बेहतरीन सड़कों और शुद्ध हवा की तारीफ करते हुए कहा, "कनाडा वाकई खूबसूरत है." लेकिन साथ ही उन्होंने उन दोस्तों का ज़िक्र भी किया जो अब भी विदेश में रह रहे हैं. उन्होंने बताया कि उनमें से कई दोस्त आज भी अपने परिवार के लिए एक स्टेबल (स्थिर) लाइफ बनाने की जद्दोजहद में लगे हैं. और इसी चक्कर में, वे भारत में रह रहे अपने माता-पिता और अपनों के साथ कीमती समय नहीं बिता पा रहे हैं.
‘भारत लौटना मेरा सबसे सही फैसला था’
शाश्वत ने कहा कि अगर उन्हें कनाडा में कोई अच्छी नौकरी मिल जाती, तो शायद वे कुछ साल और वहां रुकते, लाइफ एन्जॉय करते और फिर वापस आते. लेकिन एक बार जब वे भारत लौट आए, तो उनके पास एक क्लियर प्लान था. उन्होंने बताया, "मैंने जो कुछ भी सोचा था, पिछले डेढ़ साल में उसे पूरा कर दिखाया." आज वे कहते हैं कि उनकी ज़िंदगी बहुत अच्छी है और भारत वापस आने का फैसला बिल्कुल सही था.
शाश्वत की यह कहानी ऐसे समय में आई है जब भारतीयों के लिए विदेश जाना पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल हो गया है. साल 2025 में, कई देशों ने वीज़ा नियम सख्त कर दिए हैं, फीस बढ़ा दी है और आने वाले लोगों की संख्या भी सीमित कर दी है. कई छात्रों और प्रोफेशनल्स के लिए अब विदेश जाने का सपना न केवल महंगा हो गया है, बल्कि इसमें अनिश्चितता भी बढ़ गई है.
हर साल बड़ी संख्या में भारतीय छात्र कनाडा की यूनिवर्सिटीज़ में दाखिला लेते हैं, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. कनाडा सरकार ने स्टडी परमिट पर एक 'कैप' (सीमा) लगा दी है, जिसके तहत इस साल केवल 4,37,000 परमिट ही जारी किए जाएंगे. यह नियम अब मास्टर और डॉक्टरेट के छात्रों के साथ-साथ उन लोगों पर भी लागू होता है जो कनाडा के अंदर से ही आवेदन कर रहे हैं.
(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल चर्चा पर आधारित है और केवल सूचना के लिए है. लेख में बताए गए वित्तीय आंकड़े और फैसले व्यक्तिगत हैं और इनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है.)
Note: This content has been translated using AI. It has also been reviewed by FE Editors for accuracy.
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