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Desk Job Lifestyle Diseases: हर 40 मिनट में एक छोटा ब्रेक, थोड़ा स्ट्रेच और सही पोस्चर—बस इतना ही काफी है खुद को फिट रखने के लिए. Photograph: (Canva)
Office Job Impact on Health: आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में शायद ही कोई ऐसा हो जो खुद को व्यस्त न कहता हो. बेहतर भविष्य, बड़े सपनों और सुख-सुविधाओं की चाह में हम लगातार काम में जुटे रहते हैं. हमारा ज़्यादातर समय दफ़्तर की चार दीवारों के भीतर, कंप्यूटर या मोबाइल स्क्रीन के सामने गुजर जाता है. काम का दबाव इतना होता है कि सुबह कब शाम में बदल जाती है, इसका एहसास तक नहीं हो पाता.
इस आपाधापी में यह सच है कि हम अपने कुछ सपनों को पूरा भी कर लेते हैं, लेकिन इसकी कीमत अक्सर अपनी सेहत को चुकाकर देते हैं. दिनभर कुर्सी पर बैठकर काम करने के दुष्परिणामों की ओर हमारा ध्यान तब जाता है, जब शरीर किसी परेशानी का संकेत देने लगता है. छोटी-मोटी समस्याओं को तो हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं या अस्थायी इलाज से संभाल लेते हैं, लेकिन उन गंभीर बीमारियों का क्या, जो चुपचाप दबे पांव आती हैं और जब तक उनका पता चलता है, तब तक वे काफी नुकसान पहुंचा चुकी होती हैं.
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डेस्क जॉब से लाइफस्टाइल प्रॉब्लम्स
आइए, आज ऐसी ही कुछ समस्याओं पर गौर करें, जो लगातार बैठे रहने की आदत के कारण धीरे-धीरे हमें बड़ी मुसीबत में डाल सकती हैं.
मोटापा और मेटाबॉलिज़्म पर असर
लगातार बैठे रहने की आदत का सबसे पहला असर हमारे वजन पर पड़ता है. शारीरिक गतिविधि की कमी से शरीर की कैलोरी बर्न करने की क्षमता घट जाती है, जिससे मोटापा तेजी से बढ़ता है. इसके साथ ही मेटाबॉलिज़्म धीमा पड़ने लगता है, जो आगे चलकर डायबिटीज़ जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है.
दिल की सेहत पर खतरा
कई शोध बताते हैं कि लंबे समय तक बैठे रहने वाले लोगों में हार्ट डिसीसेस का खतरा अधिक होता है. शरीर के कम मूवमेंट्स से ब्लड सर्कुलेशन पर असर पड़ता है और खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ने लगता है. धीरे-धीरे यह स्थिति हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट अटैक जैसी गंभीर समस्याओं का रूप ले सकती है.
कमर, गर्दन और रीढ़ की समस्याएं
ऑफिस में गलत पोस्चर में बैठकर काम करना आज आम बात हो गई है. घंटों झुककर स्क्रीन देखने से गर्दन और कंधों में दर्द शुरू होता है, जो आगे चलकर सर्वाइकल और स्लिप डिस्क जैसी समस्याओं में बदल सकता है. रीढ़ की हड्डी (back bone) पर लगातार दबाव पड़ने से चलने-फिरने में भी दिक्कत आने लगती है.
आंखों और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
स्क्रीन के सामने लगातार समय बिताने से आंखों में जलन, धुंधलापन और सिरदर्द की समस्या आम हो गई है. इसके साथ ही काम का तनाव और शारीरिक गतिविधि की कमी मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है. चिड़चिड़ापन, थकान और डिप्रेशन जैसी समस्याएं धीरे-धीरे घेर लेती हैं.
समाधान क्या है?
इस समस्या से बचने के लिए ज़रूरी नहीं कि हम काम छोड़ दें, बल्कि काम करने का तरीका बदलें.
हर 30–40 मिनट में कुर्सी से उठकर थोड़ी देर टहलें. हल्की स्ट्रेचिंग करना और सीढ़ियों का इस्तेमाल करना फायदेमंद हो सकता है. इससे ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है.
ऑफिस में सही पोस्चर बना कर बैठें . कंप्यूटर स्क्रीन को आँखों के लेवल पर रखें और कमर सीधी रखें. इससे गर्दन और रीढ़ की हड्डी (बैक बोन) के दर्द से बचाव होगा.
स्क्रीन से आंखों को समय-समय पर आराम देना भी जरूरी है. हर 20 मिनट में, 20 फीट दूर किसी चीज़ को 20 सेकंड तक देखें. इससे आँखों का स्ट्रेस और धुंधलापन कम होता है.
अपनी डेस्क पर पानी की बोतल रखें और पर्याप्त पानी पिएं. ऐसा करने से आपका मेटाबॉलिज्म सही रहता है और थकान भी कम होती है
और रोज़ाना कम से कम 30 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी को दिनचर्या में शामिल करना बेहद ज़रूरी है. कुर्सी पर बैठे-बैठे ही गर्दन और कंधों को धीरे-धीरे घुमाएँ. इससे स्टिफनेस दूर होती है.
सफलता और सेहत के बीच संतुलन: छोटे बदलाव, बड़े परिणाम
सपने पूरे करना ज़रूरी है, लेकिन सेहत की कीमत पर नहीं. अगर आज हमने अपनी बैठी-बैठी ज़िंदगी पर ध्यान नहीं दिया, तो आने वाला कल हमें इसकी भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकता है. बेहतर जीवन की असली पहचान सिर्फ सफलता नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर और संतुलित जीवनशैली (lifestyle) भी है.
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