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माउंट एवरेस्ट बनाम बाजार की ऊँचाइयाँ: जहाँ खतरा छिपा है, वहीं निवेशक क्यों भागते हैं? Photograph: (AI)
माउंट एवरेस्ट की चोटी दुनिया की सबसे सुनसान जगहों में से एक है; लेकिन शेयर बाजार की “चोटी” यानी पीक के समय, माहौल बिलकुल उल्टा होता है वहाँ सबसे ज़्यादा शोर और भीड़ होती है. जब बाजार ऊँचाई पर होता है, तो अचानक हर कोई वहाँ पहुँचना चाहता है. भीड़ जुट जाती है, आत्मविश्वास आसमान छूने लगता है, और जीतना बहुत आसान लगने लगता है. ऐसा लगता है जैसे ऊपर जाने का रास्ता अब सबके लिए खुला है.
यही हम निवेशकों की अजीब आदत है, हम उस समय जल्दी नहीं करते जब असली मौका सामने होता है, बल्कि तब दौड़ पड़ते हैं जब माहौल किसी जश्न जैसा लगता है.
बाज़ार (Market) एक बहुत ताकतवर चुंबक (magnet) की तरह काम करता है. जब दाम बढ़ते हैं, तो यह चुंबक शेयर, सोना, चांदी, ज़मीन-जायदाद यानी उस समय जो भी चमक रहा होता है सबको अपनी ओर खींच लेता है. लेकिन यही चुंबक तब हमें दूर धकेल देता है जब दाम नीचे होते हैं यानी जब मौके असली होते हैं. जब कीमतें गिरती हैं और चीजें सस्ते में मिलने लगती हैं, तब हमारा आत्मविश्वास गायब हो जाता है और डर हावी हो जाता है.
हम निवेशक यह बात अच्छी तरह जानते हैं फिर भी हर बार, हर चक्र में, हम वही गलती दोबारा दोहराते हैं.
तीन भावनाएँ जो हमारे फैसले चलाती हैं
अगर हमें शेयर बाजार को सिर्फ तीन शब्दों में समझाना हो, तो वे होंगे — लालच, डर और पछतावा.
जब बाजार ऊपर चढ़ता है, तो हमारा लालच हमें कहानियाँ सुनाने लगता है. यह हमें समझाता है कि हम पीछे छूट रहे हैं. यह यक़ीन दिलाता है कि दाम आगे भी बढ़ते रहेंगे क्योंकि अब तक तो बढ़े ही हैं. सोशल मीडिया पर सफलता की कहानियाँ छा जाती हैं. सलाह हर जगह से आने लगती है- ज़ोर-ज़ोर से, बार-बार और हर दिशा से जैसे चारों ओर बस वही गूंज रही हो. और हम उसी चीज़ में और पैसा लगाने लगते हैं, जो पहले से ही महंगी हो चुकी होती है.
जब बाजार नीचे जाता है, तो डर हमारा सबसे बड़ा साथी बन जाता है. हमारी स्क्रीन लाल हो जाती हैं, एक्सपर्ट्स चिंतित दिखने लगते हैं, और हमारे दिमाग में बस बुरे-बुरे ख्याल आने लगते हैं. गिरते दामों को हम एक अच्छा मौका न समझ कर डर के मारे शेयर बेच देते हैं.
फिर आता है पछतावा — जो हमें बार-बार याद दिलाता है कि हमने कहाँ गलती की. फिर आता है पछतावा — जो हमें बार-बार याद दिलाता है कि हमने कहाँ गलती की. कभी हम सोचते हैं, “काश इसे थोड़ा पहले खरीद लिया होता तो अच्छा होता,” या “थोड़ा देर से बेचते तो ज़्यादा मुनाफ़ा मिलता.” कभी सोने को नज़रअंदाज़ करने का अफ़सोस होता है जब उसका दाम दोगुना हो गया, तो कभी चांदी न खरीदने का जब वह उछल गई. हमारे ये पछतावे अक्सर हमारी आने वाली सोच और फैसलों को तर्क (reason) से ज़्यादा प्रभावित करते हैं.
हम मानना चाहते हैं कि हम समझदारी से फैसले लेते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि पहले हमारा दिल काम करता है, दिमाग बाद में.
हम बदलते हैं तो बदलता है बाज़ार, हमारी भावनाएँ ही चलाती हैं पूरा खेल
बाज़ार ऊपर-नीचे इसलिए चलता है क्योंकि कारोबार बढ़ते हैं, मुनाफ़े बदलते हैं और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है. लेकिन बाज़ार इतनी ज़्यादा उथल-पुथल इसलिए करता है क्योंकि हमारी भावनाएँ भी इतनी ज़्यादा बदलती रहती हैं.
हमारा व्यवहार बाज़ार पर निर्भर नहीं करता बल्कि वही तो है जो बाज़ार के पूरे चक्र को दिशा देता है.
जब माहौल में जोश बढ़ता है, तो और लोग शेयर (shares) खरीदने दौड़ पड़ते हैं, जिससे दाम और ऊपर चले जाते हैं. जब घबराहट फैलती है तो लोग इसे बेचने लगते हैं और दाम और नीचे गिर जाते हैं. इसलिए बाजार की ऊँचाइयाँ और निचले स्तर किसी चार्ट से नहीं, बल्कि हमसे बनते हैं.
हर बार नया नाम, पर खेल वही पुराना
इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से जहाँ बाज़ार एक चुंबक की तरह काम करता रहा — डॉटकॉम बबल, IPO का जोश, क्रिप्टो की दीवानगी, मीम स्टॉक्स का क्रेज़, SME शेयरों की भागदौड़, रियल एस्टेट में उधारी के दांव और न जाने कितने और. हर बार “एसेट” बदल जाता है, लेकिन हमारा व्यवहार वही रहता है. किरदार नए होते हैं, मगर कहानी वही पुरानी.
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निवेश रोमांच नहीं, सब्र मांगता है
निवेश (Investment) की सबसे बड़ी कला बाजार के ऊँच-नीच का अंदाज़ा लगाना नहीं, बल्कि दोनों के लिए तैयार रहना है. सफलता इस बात में नहीं है कि हम साल की सबसे “हॉट” चीज़ में पैसा लगाएँ, बल्कि इस बात में है कि हम उसी निवेश को थामे रहें जो हमारी लंबी अवधि की योजना से मेल खाता हो चाहे बाज़ार में जोश हो या सन्नाटा. एक बात याद रखिए असली दौलत तब बनती है जब हम बाज़ार के उतार-चढ़ाव को समझते हैं, लेकिन उन्हें अपने ऊपर हावी नहीं होने देते.
शांत रणनीतियाँ, बड़े नतीजे
एसेट एलोकेशन (Asset Allocation) शायद कभी सोशल मीडिया पर ट्रेंड न करे. SIPs त्योहारों और मुनाफ़े की कहानियों में कभी हीरो की तरह न दिखें. लेकिन जब हाइप खत्म होती है, तब यही चुपचाप अपना काम करते रहते हैं. शेयर (equity), debt और गोल्ड जैसे अलग-अलग एसेट्स को मिलाकर हम बढ़त, संतुलन और सुकून — तीनों हासिल करते हैं. हम एक अस्थिर सिस्टम में स्थिरता पैदा करते हैं. हमें हर साल जीतने की ज़रूरत नहीं, बस लंबे समय में टिके रहकर जीतना ही असली सफलता है.
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निष्कर्ष
बाज़ार का चुंबक हमेशा ऊँचाई पर हमें अपनी ओर खींचेगा, और जब नीचे जाएगा तो हमें दूर धकेलेगा. हमारे आसपास की बातें हमेशा जोश को और बढ़ाएँगी, और डर को और गहरा कर देंगी. हम बाज़ार के उतार-चढ़ाव को नहीं रोक सकते, लेकिन अपने रवैये को ज़रूर बदल सकते हैं.
एवरेस्ट की चोटी खाली रहती है, क्योंकि प्रकृति जानती है वहाँ खतरा है. बाज़ार की चोटी भीड़ से भरी होती है, क्योंकि हम वही खतरा भूल जाते हैं.
हम निवेशक चाहें तो अलग रास्ता चुन सकते हैं. हम शिखर (peak) को चेतावनी की तरह और निचले स्तर (bottom) को मौका मान सकते हैं. हम अपनी एसेट एलोकेशन और अनुशासन पर डटे रह सकते हैं — भले ही आसपास का माहौल हमें कुछ और करने के लिए उकसाए.
जो आज बोरिंग लगता है, वही कल हमारी कामयाबी की वजह बनता है. दौलत बनाने की यही असली सच्चाई हमेशा से रही है.
डिसक्लेमर
नोट : इस लेख में फंड रिपोर्ट्स, इंडेक्स इतिहास और सार्वजनिक सूचनाओं का उपयोग किया गया है. विश्लेषण और उदाहरणों के लिए हमने अपनी मान्यताओं का इस्तेमाल किया है.
इस लेख का उद्देश्य निवेश के बारे में जानकारी, डेटा पॉइंट्स और विचार साझा करना है. यह निवेश सलाह नहीं है. यदि आप किसी निवेश विचार पर कदम उठाना चाहते हैं, तो किसी योग्य सलाहकार से सलाह लेना अनिवार्य है. यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है. व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं और उनके वर्तमान या पूर्व नियोक्ताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते.
मनुज जैन, CFA चार्टरहोल्डर हैं और वैल्यूमेट्रिक्स टेक्नोलॉजीज़ के सह-संस्थापक (Co-Founder) हैं.
Note: This content has been translated using AI. It has also been reviewed by FE Editors for accuracy.
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